क़मीज़ का वो गुलाबी रंग
शाम का सहर तारी था, और कमरे में रखी पुरानी मेज़ लैंप की धीमी रोशनी में नहाई हुई थी। अनवर, जिनकी पेशानी पर वक़्त ने अपनी लकीरें खींच दी थीं, अपने ही ख़यालों में गुम, ख़ामोशी से बैठे थे। उनके हाथ में एक तस्वीर का पुराना फ़्रेम था।
यह तस्वीर किसी और की नहीं, ख़ुद उनके जवानी के दौर की थी। ऐनक के शीशों के पीछे से, वो गौर से अपनी इस पुरानी तस्वीर को देख रहे थे। वो भी क्या दिन थे! घने, सियाह बाल, आँखों में चमक, और चेहरे पर एक बाग़ियाना एतिमाद। क़मीज़ का वो गुलाबी रंग, टाई का वो ख़ास अंदाज़ सब कुछ उस दौर की याद दिलाता था जब वो दुनिया को अपनी मुट्ठी में समझते थे।
लेकिन अब… वक़्त की बे-रहम रफ़्तार सब कुछ बहा ले गई थी। वो जवानी का जज़्बा, वो हँसी, वो शोर—सब एक ख़्वाब की तरह गुज़र गया था।
वो दिन जो गुज़र गए, लौट कर नहीं आएंगे,यह ख़्याल जैसे किसी नोंकदार पत्थर की तरह उनके दिल में चुभ गया। यह एक ऐसी चुभन थी जो जिस्म को नहीं, रूह को घायल कर रही थी।
उन्होंने मेज़ पर रखी पुरानी डायरी खोली। सफ़्हात पीले पड़ चुके थे, मगर उन पर लिखी इबारत आज भी ताज़ा थी। हर लफ़्ज़ उनके माज़ी की, उनकी गुज़री हुई मोहब्बतों और ख़्वाबों की गवाही दे रहा था। ये सिर्फ़ काग़ज़ के टुकड़े नहीं थे, बल्कि उनके दिल का एहसास, उनकी ज़िंदगी का वो हिस्सा था जो अब एक किताब में क़ैद हो कर रह गया था।
कमरे में गहरी तन्हाई थी। घड़ी की टिक-टिक गूँज रही थी, जैसे उन्हें याद दिला रही हो कि वक़्त रुकता नहीं, बस आगे बढ़ता जाता है। वक़्त की रफ़्तार ने उन्हें ज़िंदगी के इस मोड़ पर ला खड़ा किया था जहाँ आगे सिर्फ़ एक लाइन्तहायी ख़ामोशी थी।
उन्होंने तस्वीर को वापस उसकी जगह पर रखा, और खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर खिज़ां का मौसम था, और दरख़्तों से पत्ते गिर रहे थे। बिल्कुल उनकी ज़िंदगी की तरह, जिससे यादों के पत्ते एक-एक कर के जुदा हो रहे थे। एक लंबी और उदास आह उनके होंठों से निकली।
यह ज़िंदगी भी अजीब है, पल भर में हमें जवां कर देती है, और पलक झपकते ही हमें बूढ़ेपन के वीराने में तन्हा छोड़ देती है। और हम, बस उन गुज़रे लम्हों की तस्वीरों को सीने से लगाए, वक़्त के समंदर में एक तिनके की तरह तैरते रहते हैं।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
