कहानी

ख़तरनाक फ़रेब

शाम का वक्त था और पार्क के सुनहरी साए लंबे हो रहे थे। हवा में एक अजीब सा उदास सुकून घुला हुआ था। कबीर वहीं एक बेंच के पास खड़ा था और उसके कदम जैसे जमीन में गड़े हुए थे।

कुछ ही फासले पर, जिंदगी का एक नया और चुभता हुआ मंजर सज रहा था। सिमरन, जिसकी हँसी कभी कबीर की पूरी कायनात को रोशन करती थी, आज किसी और की बाहों में सिमटने के लिए दौड़ रही थी। उसके चेहरे की झूठी खुशी और फैली हुई बाहें बता रही थीं कि उसने अपनी एक नई दुनिया चुन ली है। सामने खड़ा काले लिबास में सजा हुआ शख़्स मुस्कुराते हुए उसका इस्तक़बाल करने के लिए तैयार था।

कबीर ने अपने दिल पर हाथ रखा। दर्द तो था, मगर आँखों से आँसू सूख चुके थे। उसने सोचा, “किसी दूसरे की छोड़ी हुई मोहब्बत से हमदर्दी तो की जा सकती है, लेकिन मोहब्बत नहीं।” उसने सिमरन को जाने दिया था, यह सोचकर कि शायद उसकी खुशी इसी रास्ते पर है। वह खुद को समझा चुका था कि अब वह उसके लिए सिर्फ़ एक अजनबी है।

मगर दिल के कोनों में एक कसक अभी भी बाक़ी थी। अचानक, हवा का रुख बदला। कबीर ने मुड़कर जाने का इरादा ही किया था कि उसके क़दम ठिठक गए। उसके मन में एक सिहरन पैदा करने वाला ख़्याल आया, 

“लेकिन मोहब्बत नहीं, वो अपने महबूब की एक आवाज़ पर वापस पलट सकता है और फिर तुम्हारा क्या होगा…?”

कबीर की नज़रें एक बार फिर सिमरन की पीठ पर टिक गईं। उसने सोचा, अगर इस पल, गले लगने से ठीक पहले, सिमरन पलटकर सिर्फ़ एक बार उसे पुकार लेती… अगर वह कह देती कि “कबीर, मुझे रोको!” तो क्या होता? क्या उसका सब्र, उसका यह दिखावा कि उसे अब फ़र्क नहीं पड़ता, रेत की दीवार की तरह ढह न जाता?

मगर सिमरन नहीं पलटी। वह आगे बढ़ी और उस काले लिबास वाले की बाहों में चली गई। कबीर ने एक गहरी सांस ली, हल्का सा मुस्कुराया और अपने क़दम आगे बढ़ा दिए।

लेकिन पुरानी शराब और पुरानी मोहब्बत का नशा बड़ा असरदार होता है। ठीक तीन साल बाद, एक ऐसा मंजर सामने आया जिसकी कबीर ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

वह ज़ख़्म जो कभी नासूर बन गए थे, जिन पर कभी कबीर ने अपने बे-लौस प्यार का मरहम रखा था,जब पुराना इश्क़ अपने तमाम धोखे और बेवफ़ाई के साथ लौटा, तो माहौल में हलचल मच गई। यह कहानी तब शुरू हुई थी जब समीर ने सिमरन का दिल टुकड़े-टुकड़े कर दिया था और दुनिया में सिर्फ़ कबीर ही वह शख़्स था जिसने उसके आँसू पोंछे थे। दो साल तक दोनों एक-दूसरे की मोहब्बत के नशे में डूबे रहे, और फ़िर एक दिन सिमरन अचानक बिना बताए ग़ायब हो गई।

वह धोखा, वह खामोश सन्नाटा और कबीर के सीने में जलता हुआ सवाल आखिर क्यों?उसे हर पल मारता रहा। और आज, ठीक तीन साल बाद, वही सिमरन लौट आई थी। दूर से उसी रास्ते पर एक साया उसकी तरफ बढ़ रहा था। वही शाल, वही अंदाज़, और चेहरे पर वही संगदिल मुस्कराहट,मानो कुछ हुआ ही न हो। वह वैसे ही अपनी बाहें फ़ैलाए कबीर की तरफ़ बढ़ रही थी।

लेकिन कबीर बदल चुका था। उसका दिल जो कभी टूटा था, अब पत्थर बन चुका था। सिमरन क़रीब आई, उसकी साँसें फूली हुई थीं, और आँखों में चमक थी कि शायद कबीर आज भी उसका इंतजार कर रहा होगा। उसने पुकारना चाहा, “कबीर!”

मगर कबीर ने ख़ामोशी से अपना हाथ उठाकर उसे रोक दिया। उसकी आँखों में बेचैनी नहीं, बल्कि नफ़रत और बेरुख़ी का समंदर था। वह समझ चुका था कि यह मोहब्बत नहीं, बल्कि एक ख़तरनाक फ़रेब था। सिमरन की बाहें हवा में ही लटक गईं। उसकी मुस्कराहट एक खौफ़नाक रूप में बदल गई क्योंकि उसने कबीर की आँखों में एक ऐसी दीवार देख ली थी जिसे कोई पार नहीं कर सकता था। कबीर बिना एक भी शब्द कहे, अपने साये को वहीं छोड़कर आगे बढ़ गया।

उसी दौरान, उस सर्द सन्नाटे को चीरती हुई एक और युवती, जो हुस्न और वक़ार की मूरत थी, वहाँ प्रकट हुई।

उसकी मीठी मुस्कान सीधे कबीर से टकराई। यह कोई बीता हुआ कल नहीं था, बल्कि एक नया और रोशन सवेरा था। कबीर ने बिना किसी हिचकिचाहट के उस हसीन युवती की तरफ़ देखा, आगे बढ़कर उसका हाथ अपने हाथ में थाम लिया, और दोनों एक नए सफ़र पर रवाना हो गए।

पीछे, वक्त के उसी कटहरे में, सिमरन एक पत्थर की तरह चुपचाप खड़ी रह गई। उसकी फ़ैलाई हुई बाहें हवा में खुली थीं और आँखें फटी की फटी रह गईं,एक ज़िंदा मूर्ति की तरह, जो यह देख रही थी कि पुरानी बेवफ़ाई और वक्त का पहिया कैसे फैसले सुनाता है।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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