भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का प्रेरक व्यक्तित्व
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल उन नेताओं का इतिहास नहीं है जिन्होंने राजनीतिक नेतृत्व किया, बल्कि उन महापुरुषों का भी इतिहास है जिन्होंने राष्ट्र के सांस्कृतिक, भाषाई और नैतिक स्वरूप को सुदृढ़ करने में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे ही महान व्यक्तित्वों में भारत रत्न राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर राजनेता, ओजस्वी वक्ता, समाज सुधारक, पत्रकार और हिंदी के अनन्य सेवक थे। उन्होंने अपने विचारों, कार्यों और जीवन मूल्यों से यह सिद्ध किया कि राष्ट्र की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसकी भाषा, संस्कृति और आत्मसम्मान की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक होती है। उनके व्यक्तित्व में त्याग, सादगी, राष्ट्रभक्ति और लोकसेवा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित कराने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसी असाधारण योगदान के कारण उन्हें वर्ष 1961 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया गया।
पुरुषोत्तम दास टंडन का जन्म 1 अगस्त 1882 को प्रयाग, वर्तमान प्रयागराज, में हुआ था। उनके पिता शलिग्राम टंडन धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और परिवार में भारतीय संस्कारों का गहरा वातावरण था। बाल्यकाल से ही उनमें अध्ययन के प्रति गहरी रुचि और राष्ट्रीय चेतना के अंकुर दिखाई देने लगे थे। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और एमए तथा एलएलबी की उपाधियाँ अर्जित कीं। इसके बाद उन्होंने वकालत का व्यवसाय आरंभ किया, किंतु उनका मन केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहा। देश में बढ़ती राष्ट्रीय चेतना और अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों ने उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन की ओर आकर्षित किया। अंततः उन्होंने सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ तो पुरुषोत्तम दास टंडन पूरी निष्ठा के साथ उसमें शामिल हो गए। उन्होंने विदेशी शासन के विरुद्ध जनजागरण किया और अनेक बार जेल यात्राएं भी कीं। वे मानते थे कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के नैतिक पुनर्निर्माण का अवसर भी है। किसानों, श्रमिकों और सामान्य नागरिकों के अधिकारों के लिए उन्होंने निरंतर संघर्ष किया। ग्रामीण भारत की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए कार्य करना उनके सार्वजनिक जीवन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल था। वे किसान आंदोलनों से भी जुड़े रहे और समाज के वंचित वर्गों की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का कार्य किया।
राजनीतिक जीवन में भी उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा। वे संयुक्त प्रांत, वर्तमान उत्तर प्रदेश, की विधान सभा के अध्यक्ष रहे और संसदीय परंपराओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्र भारत की संविधान सभा के सदस्य के रूप में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार रखे। बाद में वे लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य बने। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद तक पहुंचना उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रमाण था। यद्यपि वे अपने विचारों पर दृढ़ रहते थे, फिर भी लोकतांत्रिक मूल्यों और संगठनात्मक अनुशासन का सदैव सम्मान करते थे।
पुरुषोत्तम दास टंडन का सबसे महत्वपूर्ण और स्थायी योगदान हिंदी भाषा के उत्थान से जुड़ा हुआ है। उन्होंने हिंदी को केवल एक भाषा नहीं माना, बल्कि भारतीय एकता और सांस्कृतिक अस्मिता का आधार समझा। उनका विश्वास था कि यदि स्वतंत्र भारत को वास्तविक अर्थों में आत्मनिर्भर और आत्मगौरव से परिपूर्ण बनाना है तो प्रशासन, शिक्षा और न्याय व्यवस्था में भारतीय भाषाओं को सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए। संविधान निर्माण के दौरान राजभाषा के प्रश्न पर उन्होंने अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभाई। उन्होंने पूरे देश में हिंदी के पक्ष में व्यापक जनमत तैयार किया और अनेक मंचों से हिंदी के महत्व पर प्रभावशाली भाषण दिए। उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम था कि हिंदी को संविधान में राजभाषा का स्थान प्राप्त हुआ।
हालांकि वे हिंदी के समर्थक थे, लेकिन उनका उद्देश्य किसी अन्य भारतीय भाषा का विरोध करना नहीं था। वे भारत की सभी भाषाओं का सम्मान करते थे और उन्हें भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर मानते थे। उनका आग्रह केवल इतना था कि देश के प्रशासन और राष्ट्रीय जीवन में ऐसी भाषा को स्थान मिले जो अधिकाधिक भारतीयों के बीच संपर्क का माध्यम बन सके। उनके विचारों में भाषाई सम्मान और राष्ट्रीय एकता का संतुलित दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है।
पुरुषोत्तम दास टंडन पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। वे मानते थे कि समाचार पत्र केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में राष्ट्रीय चेतना और नैतिक मूल्यों के प्रसार का प्रभावी साधन हैं। उन्होंने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से लोगों में स्वदेश प्रेम, आत्मसम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना जागृत की। उनकी भाषा सरल, प्रभावशाली और तर्कपूर्ण होती थी। वे कठिन से कठिन विषय को भी सहज ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता रखते थे।
समाज सुधार के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय था। वे जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता और कुरीतियों के विरोधी थे। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत तभी मजबूत बन सकता है जब समाज के सभी वर्गों को समान अवसर और सम्मान प्राप्त हो। उन्होंने सादगीपूर्ण जीवन जीकर यह संदेश दिया कि सार्वजनिक जीवन में नैतिकता सबसे बड़ी पूंजी होती है। उनके व्यक्तित्व में कथनी और करनी का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता था।
पुरुषोत्तम दास टंडन को उनके उच्च नैतिक जीवन और तपस्वी व्यक्तित्व के कारण “राजर्षि” की उपाधि प्राप्त हुई। यह उपाधि केवल सम्मानसूचक शब्द नहीं थी, बल्कि उनके जीवन चरित्र का वास्तविक परिचय थी। राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने कभी व्यक्तिगत लाभ या पद की लालसा को महत्व नहीं दिया। उनका संपूर्ण जीवन राष्ट्रहित के लिए समर्पित रहा। वे सादे वस्त्र पहनते थे, सरल जीवन जीते थे और सार्वजनिक धन के उपयोग में अत्यंत सावधानी बरतते थे। उनकी ईमानदारी और निष्कलंक छवि के कारण विरोधी भी उनका सम्मान करते थे।
स्वतंत्र भारत ने उनके योगदान का सम्मान करते हुए वर्ष 1961 में उन्हें भारत रत्न से अलंकृत किया। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि राष्ट्रभाषा, राष्ट्रीय एकता और सार्वजनिक जीवन की शुचिता के उन आदर्शों को समर्पित था जिनका प्रतिनिधित्व पुरुषोत्तम दास टंडन करते थे। भारत रत्न प्राप्त करने वाले वे देश के प्रारंभिक महान विभूतियों में शामिल हैं।
1 जुलाई 1962 को उनका निधन हो गया, किंतु उनके विचार और आदर्श आज भी जीवित हैं। आज जब भाषा, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान पर व्यापक चर्चा होती है, तब पुरुषोत्तम दास टंडन का जीवन हमें यह सिखाता है कि किसी भी भाषा का सम्मान केवल भावनात्मक आग्रह से नहीं, बल्कि उसके व्यवहारिक उपयोग, शिक्षा, प्रशासन और ज्ञान परंपरा के विकास से बढ़ता है। उन्होंने यह भी बताया कि राष्ट्रनिर्माण में भाषा, संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों का परस्पर गहरा संबंध है।
आज की पीढ़ी के लिए राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का जीवन अनेक प्रेरणाएं देता है। वे हमें सिखाते हैं कि राष्ट्रसेवा केवल बड़े पद प्राप्त करने से नहीं होती, बल्कि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर समाज और देश के हित में निरंतर कार्य करने से होती है। उनका व्यक्तित्व हमें यह संदेश देता है कि सादगी, सत्यनिष्ठा, परिश्रम और मातृभाषा के प्रति सम्मान किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होते हैं। आधुनिक भारत के निर्माण में जिन महापुरुषों ने अपने विचारों और कर्म से स्थायी योगदान दिया, उनमें राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का स्थान सदैव अग्रणी रहेगा। उनका जीवन भारतीय लोकतंत्र, राष्ट्रभाषा, सांस्कृतिक स्वाभिमान और लोकसेवा का ऐसा प्रेरक अध्याय है जो आने वाली पीढ़ियों को भी निरंतर प्रेरणा देता रहेगा।
— महेन्द्र तिवारी
