लघुकथाएं
- वृक्षारोपण
उत्तरांचल के छोटे से गांव तोली में हर साल भूस्खलन होता था। सुबीर फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में था और उसकी पत्नी सोहनी स्कूल टीचर।
एक दिन पहाड़ का आधा हिस्सा गिर गया। 3 घर मिट्टी में दब गए।
सोहनी ने कहा “पेड़ कट गए तो मिट्टी कौन रोकेगा?” सुबीर ने पंचायत बुलाई। सबने कहा “पेड़ लगाने से पेट नहीं भरता।”
सुबीर और सोहनी ने हार नहीं मानी। उन्होंने स्कूल के बच्चों के साथ मिलकर बंजर ढलान पर 2000 देवदार और बांज के पौधे लगाए। हर बच्चे ने एक पौधे को गोद लिया। गर्मी में सोहनी टिफिन के साथ पानी भी ले जाती।
3 साल बाद। उसी ढलान पर तेज बारिश हुई पर इस बार मिट्टी नहीं गिरी। जड़ें मिट्टी को पकड़ चुकी थीं।
आज तोली गांव “हरा गांव” कहलाता है। सुबीर कहता है “हमने पेड़ नहीं लगाए, हमने अपने घर की दीवार खड़ी की।” और सोहनी बच्चों को पढ़ाते हुए कहती है “जड़ें जमीन में हों तो इंसान भी नहीं उखड़ता।”
- पानी के रंग
नमन शहर से गांव आया था। तालाब के किनारे बैठकर उसने देखा पानी कभी नीला, कभी हरा, कभी कीचड़ जैसा।
“दादा, पानी का रंग बदलता क्यों है?” उसने पूछा।
दादा हंसे “बेटा पानी का अपना कोई रंग नहीं होता। वो आसमान जैसा नीला, पत्तों जैसा हरा और मिट्टी जैसा भूरा दिखता है।”
शाम को फैक्ट्री का गंदा पानी नाले से तालाब में गिरा। पानी काला हो गया। मछलियां मर गईं।
नमन का चेहरा उतर गया। “अब?”
दादा बोले “जब हम पानी में गंदगी डालेंगे तो वो हमारा ही चेहरा दिखाएगा।”
अगले दिन नमन ने दोस्तों के साथ मिलकर नाले के मुंह पर जाली लगाई और सफाई की।
एक हफ्ते बाद पानी फिर साफ दिखा। नमन समझ गया – पानी आईना है। जैसा हम करेंगे, वैसा ही वो लौटाएगा।
- पछतावा
संजीवनी ने 10 साल पहले मां से झगड़ा करके घर छोड़ दिया था। मां कहती थीं “शहर मत जाओ, यहां सब है।” पर संजीवनी को बड़ी नौकरी चाहिए थी।
हर त्योहार पर मां का फोन आता “आ जाओ बेटा”। संजीवनी टाल देती “इस बार काम है मां।”
पिछले महीने खबर आई – मां को ब्रेन स्ट्रोक हुआ है। संजीवनी भागी-भागी गांव पहुंची। मां बिस्तर पर थीं, बोल नहीं पाती थीं। पर संजीवनी को देखते ही उनका हाथ उसके गाल तक आया।
3 दिन बाद मां चली गईं। अलमारी में संजीवनी के लिए एक स्वेटर रखा था। आधा बुना हुआ। साथ में चिट्ठी – “ठंड आ रही है, पूरा कर दूंगी।”
आज संजीवनी उसी अधूरे स्वेटर को सीने से लगाकर बैठी है। नौकरी, प्रमोशन, शहर… सब है।
सिर्फ वो एक “हां मां, आ रही हूं” कहना बाकी रह गया।
वही पछतावा अब हर रात उसका कंबल बनकर उसे ढकता है।
— विकास कुमार शर्मा
