मुक्तक/दोहा

गेंद और बचपन

नन्हे हाथों की खुशी, नभ जितने अरमान।
गेंद संग ही खेलता, अपना सारा जहान॥

छत हो, गाड़ी या गली, हर जगह उत्साह।
बचपन ढूँढे खेल में, जीवन की हर राह॥

जीत-हार का ज्ञान क्या, मन रहता निष्काम।
हँसी बिखेरे हर घड़ी, यही बचपन का काम॥

छोटी-सी मुस्कान में, सपनों का संसार।
भोले मन की रोशनी, सबसे बड़ा उपहार॥

मोबाइल से दूर रह, खेले खुलकर आज।
बचपन की हर एक घड़ी, जीवन का है ताज॥

नन्हे हाथों की खुशी, नभ जितने अरमान।
गेंद संग ही खेलता, अपना सारा जहान॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh