लघुकथा

अविस्मरणीय रक्षाबंधन

वैसे तो बेटियों को हर पल मायके की याद आती है, लेकिन सावन के आते ही सभी बेटियों-बहिनों को मायके की याद विशेष रूप से सताती है. तीज का त्योहार आता है, मायके में सखियों के साथ झूलने का आनंद ही अलग होता है और ​रक्षाबंधन की उमंग की तो बात ही अलग है! रक्षाबंधन केवल रेशम का एक धागा बांधने का त्यौहार नहीं है, यह सुरक्षा और निःस्वार्थ स्नेह के उस पावन संकल्प में बंधने का नाम है जो दो दिलों को हमेशा जोड़े रखता है.
यही भाई-बहन का जुड़ना-जोड़ना बचपन की याद दिलाता है. चपन की दुनिया भी कितनी निराली होती है. छोटी-सी बात पर भाई-बहन का महायुद्ध छिड़ना, भिड़ना और कुछ ही देर बाद मनाना. आज जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है, उन नोक-झोंकों में भी कितना गहरा अपनापन छिपा था.
इस बार तो रक्षाबंधन के दो महीने पहले ही नमिता को भाई नन्नू को राखी कैसे बांधेगी की चिंता हो रही थी. इस बार भाई की पोस्टिंग अमेरिका में होने के कारण उसका भाई और मायका अमेरिका में जो थे! वह राखियां बनाने के लिए रेशम के धागे लेने गई ही थी कि उसकी मम्मी का फोन आ गया-
“इस बार नन्नू को राखी कैसे बांधेगी?” मम्मी ने पूछा.
“वही तो सोच रही हूँ, अभी राखियां बनाने के लिए रेशम के धागे लेने बाजार आई हुई हूँ.” नमिता की आवाज में मां की आवाज की खुशी के साथ भाई को राखी न बांध पाने की चिंता की मिली-जुली झलक भी थी.
“ऐसा कर कि इस बार राखी यहाँ आकर बांधना, दामाद जी को कहना कि तीन महीने छुट्टी ले लें या वर्क फ्रॉम होम की इजाजत ले लें. बेटा तो अभी स्कूल जाने लायक है ही नहीं. हम तीनों का तीन महीने का वीज़ा और टिकटें भेज रहे हैं, हाँ राखियां खूब सारी बनाकर लाना. नन्नू के देशी-विदेशी दोस्त भी राखियां बंधवाने के लिए तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं.” मां लगातार बोले जा रही थी और नमिता आंसुओं की झड़ी रोक नहीं पा रही थी.
“राखी पर मायका बुलाता है तो बात ही कुछ अलग हो जाती है. दूर रहकर भी कच्चे धागों का अटूट बंधन अटूट ही रह सकता है. राखी के लिए दूरी की कोई सीमा नहीं होती, अटूट बंधन अटूट ही रहता है!” सोचकर नमिता बाजार से मायके जाने के लिए जरूरी सामान लेने लगी.
फिर तो इस बार नमिता का रक्षाबंधन अविस्मरणीय हो गया था!

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244