कहानी – गुरु दक्षिणा
गांव के छोर पर बना वह प्राथमिक विद्यालय बरसों से मास्टर केशवराम की पहचान था। पूरे इलाके में लोग उन्हें प्यार से केशव मास्टर कहते थे। चालीस साल की नौकरी में उन्होंने न जाने कितनी पीढ़ियों को अक्षर पहचानना सिखाया था। उनकी कक्षा में न कोई पंखा था, न कोई सुविधा, बस एक टूटा हुआ ब्लैकबोर्ड और चाक का एक डिब्बा। फिर भी केशव मास्टर हर सुबह उसी उत्साह से विद्यालय आते जैसे यह उनका पहला दिन हो। उनकी आवाज में एक अलग ही ठहराव था, जो शरारती से शरारती बच्चे को भी शांत कर देता था।
केशव मास्टर की पत्नी बरसों पहले गुजर चुकी थीं। उनका कोई संतान नहीं था। लोग अक्सर उनसे पूछते कि अकेलापन कैसे काटते हैं, तो वे मुस्कुरा कर जवाब देते कि उनके सैकड़ों बच्चे हैं, जो हर साल स्कूल की दहलीज पार करके बड़ी दुनिया में चले जाते हैं। उनके घर की दीवारों पर टंगी तस्वीरों में उन्हीं बच्चों की झलक थी, जो अब डॉक्टर, इंजीनियर और शिक्षक बन चुके थे। हर तस्वीर के नीचे केशव मास्टर ने बड़े जतन से एक तारीख और नाम लिख रखा था।
गांव के लोग जानते थे कि केशव मास्टर की जेब हमेशा खाली रहती है, क्योंकि जो कुछ भी वे कमाते, उसका बड़ा हिस्सा किसी न किसी बच्चे की जरूरत में लग जाता। कभी किसी की फीस भरनी होती, कभी किसी की किताबें खरीदनी होतीं, तो कभी किसी बीमार बच्चे की दवाई का इंतजाम करना होता। वे कभी इसका बखान नहीं करते थे। उनका मानना था कि दान वही सच्चा होता है जो चुपचाप दिया जाए, बिना किसी को बताए और बिना किसी बदले की उम्मीद के। इसी सोच के साथ उन्होंने अपना पूरा जीवन बिता दिया, न कभी किसी शिकायत के साथ, न कभी किसी पछतावे के साथ।
गांव के बच्चों में एक लड़का था, नाम था अर्जुन। अर्जुन का परिवार बेहद गरीब था। उसके पिता खेतों में मजदूरी करते थे और मां बीमार रहती थीं। अर्जुन पढ़ने में बहुत होशियार था, लेकिन घर की हालत ऐसी थी कि हर साल उसकी पढ़ाई छूटने का खतरा बना रहता। केशव मास्टर ने अर्जुन में एक चमक देखी थी, वही चमक जो उन्होंने वर्षों पहले अपने भीतर देखी थी जब वे खुद एक गरीब किसान के बेटे थे। उन्होंने चुपचाप अर्जुन की किताबों का खर्च उठाना शुरू कर दिया। कभी वर्दी के पैसे, कभी परीक्षा शुल्क, सब कुछ केशव मास्टर अपनी छोटी सी पेंशन में से निकालते और अर्जुन के घर तक पहुंचा देते, इस शर्त पर कि किसी को इसकी भनक न लगे।
समय बीतता गया। अर्जुन ने दसवीं में पूरे जिले में सबसे अधिक अंक पाए। उसके बाद शहर के एक बड़े कॉलेज में उसे दाखिला मिल गया। जाने से पहले वह केशव मास्टर के पास आया और उनके पैर छूकर बोला, गुरुजी, आपने जो किया है, मैं वह कभी नहीं भूलूंगा। मैं वादा करता हूं कि एक दिन मैं आपके पास वापस आऊंगा। केशव मास्टर ने उसके सिर पर हाथ रखा और बस इतना कहा, बेटा, तुम आगे बढ़ो, यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।
अर्जुन शहर चला गया। पहले कुछ महीनों तक उसके पत्र आते रहे। वह अपनी पढ़ाई के बारे में, अपने नए दोस्तों के बारे में और शहर के जीवन के बारे में लंबे लंबे खत लिखता। केशव मास्टर हर पत्र को कई बार पढ़ते और फिर संभाल कर एक पुराने बक्से में रख देते। लेकिन धीरे धीरे पत्रों का आना कम होता गया। पहले महीने में एक पत्र आता, फिर तीन महीने में, फिर साल में एक बार त्योहार पर बस एक छोटा सा संदेश। केशव मास्टर को इसका कोई बुरा नहीं लगा। वे जानते थे कि जीवन की भागदौड़ में हर किसी को आगे बढ़ना होता है, और पीछे मुड़कर देखने का समय कम ही मिलता है।
गांव के कुछ लोग कभी कभी केशव मास्टर से पूछ बैठते कि अर्जुन का क्या हाल है, क्या वह अब भी याद करता है अपने गांव को। ऐसे सवालों पर केशव मास्टर का जवाब हमेशा एक जैसा होता। वे कहते कि जिस पौधे को हम अपने हाथों से सींचते हैं, उसका बड़ा होकर दूर छांव देना ही उसकी सफलता है, न कि हमारे पास लौट आना। यह सुनकर सामने वाला व्यक्ति चुप हो जाता, क्योंकि इतनी गहरी बात के आगे कोई तर्क टिक नहीं पाता था। भीतर ही भीतर हालांकि केशव मास्टर के मन में भी कभी कभी एक हल्की सी उदासी उठती, जिसे वे अपने काम में डूबकर शांत कर लेते।
साल दर साल बीतते गए। केशव मास्टर बूढ़े होते गए। उनकी आंखों की रोशनी कमजोर पड़ने लगी, हाथ कांपने लगे, लेकिन उन्होंने विद्यालय जाना नहीं छोड़ा। एक दिन विद्यालय के प्रधानाचार्य ने उन्हें बुलाकर बड़े सम्मान के साथ बताया कि अब उनकी सेवानिवृत्ति का समय आ गया है। केशव मास्टर ने चुपचाप सिर हिलाया और अपने चालीस साल के सफर को समेटना शुरू किया। उन्होंने अपनी अलमारी से वह पुराना बक्सा निकाला जिसमें बच्चों के पत्र, तस्वीरें और छोटी छोटी यादें रखी थीं। उन्हें एक एक करके देखते हुए उनकी आंखों में आंसू आ गए, लेकिन यह दुख के आंसू नहीं थे, यह संतोष के आंसू थे।
सेवानिवृत्ति के दिन विद्यालय में एक छोटा सा समारोह रखा गया। गांव के बहुत से लोग आए, कुछ पुराने छात्र भी आए जो अब बड़े हो चुके थे। सब ने मिलकर केशव मास्टर को धन्यवाद दिया, उन्हें फूलों की माला पहनाई और एक स्मृति चिन्ह भेंट किया। समारोह के बीच में अचानक एक कार गांव की धूल भरी सड़क पर आकर रुकी। उसमें से एक सुंदर सा युवक उतरा, कुर्ता पहने, चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान लिए। यह अर्जुन था।
अर्जुन ने भीड़ को चीरते हुए सीधे केशव मास्टर के पास जाकर उनके पैर छुए। केशव मास्टर ने उसे पहचानने में एक पल भी नहीं लगाया। उनकी बूढ़ी आंखों में एक चमक आ गई। अर्जुन ने बताया कि वह अब शहर में एक बड़े अस्पताल में डॉक्टर बन चुका है, और उसने अपने गांव के लिए एक स्वास्थ्य केंद्र बनवाने की योजना बनाई है, जिसका शिलान्यास वह चाहता है कि उसके गुरुजी के हाथों से हो। केशव मास्टर के पास शब्द नहीं थे। उन्होंने बस अर्जुन को गले लगा लिया।
उस शाम, जब समारोह समाप्त हो गया और सब लोग चले गए, अर्जुन केशव मास्टर के छोटे से घर में उनके साथ बैठा रहा। उसने बताया कि कैसे शहर की चकाचौंध में वह कभी कभी खुद को भूल जाता था, लेकिन जब भी वह किसी मरीज को ठीक करता, उसे केशव मास्टर की वह सीख याद आ जाती कि असली शिक्षा वही है जो दूसरों की सेवा में लगे। उसने माफी मांगी कि इतने सालों तक वह गांव नहीं आ सका, कि पत्र लिखना भी उसने कम कर दिया था अपनी व्यस्तता के कारण। केशव मास्टर ने उसकी बात बीच में ही रोक दी और कहा कि किसी शिक्षक को अपने छात्र से माफी की जरूरत नहीं सुननी होती, बस यह जान लेना ही काफी होता है कि उसका बोया हुआ बीज कहीं न कहीं फल दे रहा है।
अगले कुछ महीनों में अर्जुन ने अपनी बात रखी। गांव में एक छोटा सा स्वास्थ्य केंद्र बनकर तैयार हुआ, जिसका नाम रखा गया केशवराम स्वास्थ्य सेवा केंद्र। शिलान्यास के दिन केशव मास्टर ने कांपते हाथों से पट्टिका का अनावरण किया। उनके चेहरे पर वही पुरानी गंभीरता थी, लेकिन आंखों में एक नई चमक भी थी। उन्होंने वहां इकट्ठा हुए लोगों से बस इतना कहा कि जीवन में कोई भी काम छोटा नहीं होता, अगर वह किसी और के जीवन में उजाला भर सके।
उसके बाद के वर्षों में अर्जुन नियमित रूप से गांव आता रहा। वह हर महीने कुछ दिनों के लिए स्वास्थ्य केंद्र में मुफ्त सेवा देता और केशव मास्टर के साथ शाम बिताता। दोनों बगीचे में बैठकर पुरानी बातें करते, कभी हंसते, कभी चुप बैठे रहते। केशव मास्टर अब भी हर सुबह विद्यालय के पास से गुजरते, नए बच्चों को खेलते देखकर मुस्कुराते और सोचते कि उनका असली धन यही है, वह ज्ञान जो उन्होंने बांटा, वह प्रेम जो उन्होंने बिना किसी शर्त के दिया।
बरसों बाद, जब केशव मास्टर का देहांत हुआ, तो उनके अंतिम संस्कार में गांव का हर घर शामिल हुआ। दूर दूर से पुराने छात्र भी खबर पाकर चले आए, कोई अपने काम से समय निकालकर, कोई रात भर सफर करके। सबकी आंखों में एक ही भाव था, अपने उस गुरु को अंतिम विदाई देने का, जिसने उन्हें केवल अक्षर पढ़ना ही नहीं, बल्कि जीवन जीना भी सिखाया था। लेकिन सबसे आगे खड़ा था अर्जुन, जिसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में एक ऐसा संतोष था जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उसने केशव मास्टर की चिता को अग्नि देते हुए मन ही मन प्रण लिया कि वह अपने गुरु की तरह ही निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करता रहेगा। केशव मास्टर का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, लेकिन उनकी सीख, उनका प्रेम और उनका समर्पण गांव के हर घर में, हर बच्चे की किताब में और हर उस व्यक्ति के दिल में हमेशा जीवित रहा जिसने कभी उनसे कुछ सीखा था। यही सच्चे गुरु की सबसे बड़ी पहचान होती है, कि वह अपने शरीर के जाने के बाद भी अपने कर्मों के जरिए हमेशा के लिए अमर हो जाता है।
— महेन्द्र तिवारी
