ग़ज़ल
कुछ ख़बर होने न पायी ख़त्म क़िस्सा कर गयी
यक़बयक़ इक ज़िंदगी को मौत धप्पा कर गयी
कोई सहरा में नहीं था एक बस मेरे सिवा
किस की परछाईं थी वो जो मुझ पे साया कर गयी
इस से तो बेहतर थी ढिबरी,या पुरानी लालटेन
शह्र की ये रौशनी तो मुझको अंधा कर गयी
ये अना थी,या कि ज़िद थी,या कमी विश्वास में
जो ग़लतफ़हमी दिलों के बीच पैदा कर गयी
तीरगी की अहमियत आयी समझ, जब रौशनी
नींद में मेरे ख़लल इक रोज़ पैदा कर गयी
ज़िंदगी का फ़लसफ़ा ‘अज्ञात’ तब समझा कि जब
कोई मिट्टी, मिट्टी को मिट्टी में दफ़ना कर गयी
— अजय अज्ञात
