गीत
साँस की कच्ची गिरह यादों का मेला यहाँ
भीड़ में भी आदमी फिरता अकेला यहाँ
अक्स को है पढ़ना यहाँ ख़ुद से ही है लड़ना यहाँ
उम्र की सीढ़ी चढ़े मिट्टी में गिरना यहाँ
खुलना यहाँ घुलना यहाँ अंतस में मिलना यहाँ
धूल की इस देह का रूह बन के खिलना यहाँ
ओस की ये बूँदें हैं पत्तों पे सोई हुईं
एक ठंडी फूँक में देखो हैं खोई हुईं
वक्त के इस हाथ में रेत की जागीर है
आँख जो झपकी समझ मिटती तस्वीर है
अपना यहाँ सपना यहाँ अपनों में खोना यहाँ
खुलना यहाँ घुलना यहाँ अंतस में मिलना यहाँ
काँच के घरौंदे हैं शब्दों की दीवार है
झूठ के बाज़ार में सच की ही हार है
नेकी का जो दीप है मन में जला ले तू
स्वार्थ की इस धूप में साया बना ले तू
जुड़ना यहाँ मुड़ना यहाँ यादों में रहना यहाँ
खुलना यहाँ घुलना यहाँ अंतस में मिलना यहाँ
कल इसी संसार में होंगे नए किरदार सब
होगी नई महफ़िल यहाँ होंगे नए अहसास सब
हम हों न हों इस भीड़ में गूँजेगी अपनी अनकही
धड़कन किसी की सुनेगी अपनी कहानी ही कहीं
यादें हमारी छाँव बन हर धूप में लहराएँगी
मिट्टी भले सो जाए पर खुशबू सदा रह जाएगी
हँसना यहाँ रोना यहाँ यादों को बोना यहाँ
खुलना यहाँ घुलना यहाँ अंतस में मिलना यहाँ
रंज इस संसार में कुछ न कमा पाएगा
प्रेम की जो पूँजी है साथ ले ही जाएगा
मौन की है भाषा जो सुन ले उसे ध्यान से
चलना है इस राह पर ऊँचे बड़े मान से
लिखना यहाँ मिटना यहाँ मिट्टी का होना यहाँ
खुलना यहाँ घुलना यहाँ अंतस में मिलना यहाँ
— भानु शर्मा रंज
