गजल
तेज है धूप भी और है लंबा सफर
पथरीली राहों का भी असर आ गया
पता ही नहीं मंजिल अपनी कहां
उजड़ा हुआ खंडहर आ गया
चाबी मिलती नहीं बंद है दरवाजे
और सच बोलने का हुनर आ गया
जब से टूटा पलंग निवाड़ जर्जर हुई
चटाई पर भी करना गुजर आ गया
वह मुसाफिर हैं हम राह भटके हुए
कोई बताता नहीं जाना है अब कहां
शाम ढलने को है रोशनी कम हुई
हमको सितारा नजर आ गया
हम समझते हैं खेला नियति ने रचा
जिसको जाना वह चला जाएगा
पूछने वाला कोई मिलेगा नहीं पथ
भूला बंजारा इधर आ गया
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
