हास्य व्यंग्य

नो बीमा, नो पेट्रोल – अब समझ में आएगा जिम्मेदारी का माइलेज

हम भारतीय बड़े अद्भुत लोग हैं। नियमों का सम्मान करने में नहीं, उन्हें चकमा देने में विश्वगुरु बनने का सपना देखते हैं। ट्रैफिक सिग्नल लाल हो तो उसे सुझाव समझते हैं, हेलमेट को सिर की सुरक्षा नहीं बल्कि चालान से बचने का उपकरण मानते हैं, और वाहन बीमा… उसे तो ऐसे टालते हैं जैसे बैंक का पुराना कर्ज़ हो।
वाहन खरीदने की बात हो तो शोरूम में सबसे पहले पूछा जाता है-“टॉप मॉडल कौन-सा है?” सीट कवर इटली वाला चाहिए, हॉर्न अमेरिका वाला, स्टीकर दुबई वाला, नंबर वीआईपी वाला और मोबाइल होल्डर ऐसा कि गाड़ी कम, कॉकपिट ज़्यादा लगे। लेकिन जैसे ही बीमा की बात आती है, चेहरे पर ऐसी उदासी छा जाती है जैसे किसी ने संपत्ति कर दोगुना कर दिया हो।
कुछ लोगों का सिद्धांत बड़ा साफ होता है-“दुर्घटना होगी तो देखी जाएगी, अभी तो पेट्रोल भरवा लो।” मानो दुर्घटना पहले व्हाट्सऐप पर संदेश भेजेगी-“प्रिय वाहन चालक, मैं कल दोपहर तीन बजे आपके साथ होने वाली हूँ, कृपया तब तक बीमा करवा लें।”
अब सर्वोच्च न्यायालय ने “नो बीमा, नो पेट्रोल” जैसी सोच को हवा दी तो कई लोगों की नींद उड़ गई। जिन लोगों ने वर्षों तक बीमा को खर्च समझा था, उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि पेट्रोल पंप भी अब संस्कार सिखा सकता है।
कल्पना कीजिए, पेट्रोल पंप पर दृश्य कैसा होगा—
“भैया, पाँच सौ का पेट्रोल डाल दो।”
“पहले बीमा दिखाइए।”
“अरे, पेट्रोल भरना है या पासपोर्ट बनवाना है?”
“साहब, नियम है।”
“तो भाई, दो सौ का नियम और तीन सौ का पेट्रोल डाल दो!”
कुछ लोग तुरंत अपना पुराना बीमा कागज़ निकालेंगे, जिस पर तारीख़ देखकर मशीन भी हँस पड़ेगी। फिर कहेंगे-“भैया, फोटोस्टेट चल जाएगी?”
हमारे देश में असली प्रतिभा नियमों का पालन करने में नहीं, उनसे बच निकलने के उपाय खोजने में लगती है। यदि “नो बीमा, नो पेट्रोल” लागू हो गया, तो अगले ही दिन सोशल मीडिया पर वीडियो आने लगेंगे-“घर बैठे पाँच मिनट में बीमा जैसा दिखने वाला कार्ड कैसे बनाएँ?”
यूट्यूबर बताएगा-“दोस्तों, वीडियो को लाइक कीजिए, सब्सक्राइब कीजिए, आज मैं बताऊँगा कि पेट्रोल पंप वाले को कैसे भ्रमित करें…”
लेकिन बेचारा कैमरा न लाइक देखता है, न सब्सक्राइब। वह सीधे रिकॉर्ड देखता है।
दरअसल, हमारे समाज में एक विचित्र बीमारी है। दस लाख की कार खरीदने में गर्व महसूस होता है, लेकिन पाँच हजार का बीमा कराने में आत्मा काँप जाती है। गाड़ी की सर्विसिंग समय पर होगी, पॉलिश हर महीने होगी, टायर चमकेंगे, लेकिन बीमा की तारीख़ बीत जाए तो जवाब मिलेगा-“यार, ध्यान ही नहीं रहा।”
ध्यान तब आता है जब कोई दुर्घटना हो जाती है। फिर अस्पताल, पुलिस, अदालत और मुआवज़े के चक्कर शुरू होते हैं। तब समझ आता है कि जिस बीमे को फिजूल खर्च समझा था, वही सबसे सस्ता सौदा था।
कुछ लोग कहेंगे-“सरकार जनता पर नया बोझ डाल रही है।”
अरे भाई, सरकार पेट्रोल नहीं रोक रही, आपकी लापरवाही रोकना चाह रही है। सड़क पर आपकी बिना बीमा वाली गाड़ी केवल आपकी समस्या नहीं है। यदि किसी निर्दोष को चोट लगती है, तो उसका इलाज, उसका परिवार, उसकी रोज़ी-रोटी सब प्रभावित होते हैं।
असल में बीमा गाड़ी का नहीं, इंसानियत का होता है।
फिर भी हमारे कुछ महानुभाव हार मानने वाले नहीं हैं। वे कहेंगे-“कोई ऐसा पेट्रोल पंप बताओ जहाँ बीमा न पूछा जाए।”
फिर कोई सलाह देगा-“मेरा एक जानकार है…”
यानी नियम बनते ही जुगाड़ उद्योग का नया स्टार्टअप तैयार!
लेकिन सच यही है कि यदि पेट्रोल पंप पर बीमा पूछे जाने लगे, तो लाखों लोग मजबूरी में ही सही, जिम्मेदार नागरिक बनेंगे। कभी-कभी अच्छे संस्कार समझाने से नहीं, छोटी-सी असुविधा से आते हैं।
इसलिए “नो बीमा, नो पेट्रोल” केवल एक प्रशासनिक नारा नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता का टेस्ट है। यदि वाहन खरीदने की क्षमता है, तो उसका बीमा कराने की जिम्मेदारी भी होनी चाहिए।
वरना आने वाले दिनों में नया नारा भी तैयार रखिए-
“गाड़ी लाखों की, बीमा शून्य का… फिर दुर्घटना के बाद सरकार से पूरा हिसाब माँगने का!”
और यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है-जिम्मेदारी अपनी नहीं चाहिए, लेकिन सुरक्षा और मुआवज़ा पूरा चाहिए।

— संजय एम तराणेकर

संजय एम. तराणेकर

जन्म वर्ष 1968 कवि, स्वतंत्र लेखक व टिप्पणीकार। शिक्षा स्नातक एवं गायन में 1986 में विद् किया होकर केन्द्रीय सचिवालय हिन्दी परिषद् द्वारा हिन्दी आषुलिपि प्रतियोगिता में वर्ष 1992 प्रषस्ति-पत्र प्राप्त। विशेष रूचि-बॉलीवुड फिल्में एवं संगीत, पुस्तक समीक्षा एवं राजनीति। मैं मूलतः मध्य प्रदेश के स्वच्छता में हैट्रिक लगा चुके एवं चार बार नंबर वन बनें स्मार्ट सिटी इन्दौर का निवासी हूँ। 1990 के दशक में लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी प्रारंभिक शुरूआत की। लेखकीय सुकून कितना संतोष देता है, इसकी बात ही कुछ और है। युवा होने पर फिल्मी कलाकारों की तरफ झुकाव ने फिल्मों पर आलेख लिखने की प्रेरणा दी। इसमें मेरी रूचि भी थी। विशेषकर पुराने फिल्मी कलाकारों के जीवन से सम्बंधित आलेखों पर अधिक ध्यान आकर्षित रहा। बावजूद इसके लघु कथा व कविता (बतौर युवा कवि आकाशवाणी इन्दौर में कविता पाठ के भी कई अवसर प्राप्त हुए है।) के अलावा सामयिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विषयों पर समय-समय पर अपनी लेखनी को आयाम देने के प्रयास आज भी अनवरत हैं। अब तक विभिन्न समाचार-पत्रों में मुख्य रूप से बॉलीवुड/सिनेमा की साप्ताहिक मेगजीनों में आलेखों एवं पुस्तक समीक्षाओं का प्रकाशन हो चुका है। इनमें ‘लोकमत समाचार-आकर्षण व शो टाईम, राजस्थान पत्रिका-बॉलीवुड, पंजाब केसरी व दैनिक ट्रिब्यून के मनोरंजन, राज एक्सप्रेस-राज सिनेमा, द सी एक्सप्रेस-सी सिनेमा, हरि-भूमि के रंगारंग व रविवार भारती, चौथा संसार के बॉलीवुड, बीपीएन टाईम्स के शो बीपीएन व तरंग, लोकदशा के पर्दा-बेपर्दा व विविधा, नव-भारत एवं स्वतंत्र भारत के अलावा कई स्थानीय समाचार-पत्रों में भी आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। वहीं ‘स्वतंत्र वार्ता एवं डेली हिन्दी मिलाप‘ में कई वर्षो तक नियमित रूप से लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 31, संजय नगर, इन्दौर-452011 मध्य प्रदेश, (वार्ता+वाट्स एप) 98260.25986 ईमेलः s.taranekar@rediffmail.com, Facebook – https://www.facebook.com/Taranekar9

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