गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

चांदनी छिटकी हुई है शुभ्र ज्योत्स्ना में
ओढ़ लूं मैं भी अनूठी रात पूनम की।
तुम बुलाओ और मैं आऊं नहीं क्यों,
गुनगुने एहसास सी है रात पूनम की।
एक साये सी हमारे संग चलती जा रही,
प्यार का मधुमास लेकर रात पूनम की।
रासलीला भी रचाऊं और मीठे गीत गाऊं,
चांदनी में है नहायी रात पूनम की।
बस तुम्हारी गंध से महका करे ये तन-बदन
खुशनुमा एहसास लायी रात पूनम की।
घने बालों में तुम्हारे टांक दे कोई गुलाब,
भर गई है खुशबुओं से रात पूनम की।
बांसुरी कान्हा के होंठों राधिका बेसुध हुई
सोचना कैसे ही बीती रात पूनम की।

— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

द्वारा विद्या रमण फाउण्डेशन 121, शंकर नगर,मुराई बाग,डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207 M-9670040890

Leave a Reply