कहानी – शब्दों से परे
महानगर की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुबह भी जैसे घड़ी की सुइयों के इशारे पर होती है। यहाँ लोग बस
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Read Moreदिन ढलते ही शहर की रौनक बदल जाती थी। एक तरफ़ इत्र की ख़ुशबू और दूसरी तरफ घुंघरूओं की झनकार।
Read Moreशाम का सहर तारी था, और कमरे में रखी पुरानी मेज़ लैंप की धीमी रोशनी में नहाई हुई थी। अनवर,
Read Moreशाम का वक्त था और पार्क के सुनहरी साए लंबे हो रहे थे। हवा में एक अजीब सा उदास सुकून
Read Moreशाम का वक्त था, कमरे में मद्धम रोशनी जल रही थी। मेज़ पर अबू की पुरानी डायरी रखी थी, जिसके
Read Moreमेरी कॉलोनी में रहने वाले एक वृद्ध की दिनचर्या वर्षों से नहीं बदली थी। हर शाम वह चारपाई पर बैठकर
Read Moreवह सुनहरी दोपहर थी जब दफ़्तर में दाख़िल हुआ और काग़ज़ पर नज़र डाली, तो पलट कर देखा कि सामने
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