कविता

महा ध्यान

कांच की दीवार को फांद पहुच गयी थी मैं उस पार मैं थी नदी की सतह पर बैठी ऊपर तट पर था एक मंदिर नदी के भीतर जल रही थी एक ज्योति मैंने पूछा था स-आश्चर्य कैसे जल रही ज्योति जल में बताया शून्य ने यही तो हैं ईश्वर की शक्ति अपार जो मानव करेंगे […]

कविता

कौड़ी के मोल

कौड़ी के मोल में बिक गयीं आधुनिक घर की अनुपयोगी चीजें जिनसे जुडी थी अनगिनत यादें । वो पुरानी साइकिल । स्मरण है एक साइकिल और हम तीन भाई चलाने को होती थी खूब लड़ाई । फिर बारी-बारी हांकते साइकिल का पैंडल । वो पुरानी टीवी । टीवी कम रोगी ज्यादा हर हफ्ते इलाज को […]

कविता

समय की कसौटी

समय की कसौटी बीता समय पंख लगा, क्षितिज में समाया है, और हम कर रहे समीक्षा, हमने क्या खोया क्या पाया है, समय की कसौटी पर वही मानव खरा है, जिसके जीवन में धर्म की जय हो, जिसके जीवन में कर्म की विजय हो, जिसका जीवन हर पल सुखमय हो, जिसकी वाणी हरदम मधुमय हो, […]

कविता

फैसला

  तुम्हारे और मेरे बीच अनंत फ़ासिला है पर मेरे साथ चलने का तुझमे हौसला है यूँ तो जिंदगी में सदा तन्हा ही रहना है जिससे घिरा हूँ वो तेरी यादों का मेला है तेरी प्यार भरी निगाहें मेरा पिछा करती हैं पंखुरियों से भी चुभन को मैंने झेला है मील के पत्थरो सी मिलती […]

कविता

हाइकु कविताएँ

जहां हमारा मन जाकर बार-बार अटक जाता है, मन को कुछ खोने का डर और मिलने की आस लगी रहती है, जो हमें सुखी-दुखी, मान-अपमान, लाभ-हानि, जय-पराजय देती है, वही हमारी माया है। यानी किसी शख्स के संसार में उलझे रहने की वृत्ति का नाम माया है। माया अपनी कलाकारी से जीवों को खुद में […]

कविता

कृष्ण प्राणप्रिये (भाग ३)

कोमल तन कमल नयनों वाले चितचोर बृज के नटखट ग्वाले प्रेम का रस बरसाने वाले राधा का मन भाने वाले माखन मिसरी चुराने वाले नैनो में नित्य समाने वाले जागृत कर दो चेतना मेरी भरदो मन के प्यासे प्याले!! करुनासिन्धु कहलाते हो सबके मन को बहलाते हो माधव राधारमण मुरारी जगदीश उपमाये सब पाते हो […]

कविता

सघन नीरवता

  तुम्हारी चेतना के ध्यान कक्ष में मेरी सघन नीरवता की है गूँज तुम्हारे मन की आँखों के समक्ष कभी साये सा आ जाता हूँ सशरीर धरकर अपना रूप कभी कौँध जाता हूँ तड़ित सा एकाएक उभरकर चमकदार धूप अपने ह्रदय के आँचल की छोर में मुझे बांध लो मैं कहीं न जाऊं गुम गुनगुनाता […]

कविता

बुखार

वर्षों से लागे है जैसे इमाम के ईमान को आ रहा बुखार अब मियादी हो चला दिल -दिमाग से चलो दें इसे बुहार मालिक को काटे है गैरों के तलवे चाटे है यह भले समाज में दीमक के कीटाणू फैलाये है यह खुदा के नाम पर खुदाई कर गड्ढे नहीं करने देंगे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई […]

कविता

कृष्ण प्राणप्रिये (भाग २)

जग छोटी छोटी माला लेकर नाम तुम्हारा रटता है क्षण क्षण ऐसे भक्तों का बस ऐसे ही माधव कटता है जो झुककर चरण पखार रहे जो तुमपर प्राण निछार रहे जो देख तुम्हे बस रोते हैं या अपना आपा खोते हैं ऐसे बिरले दीवानों में एक नाम मेरा भी जोड़ लो तुम मेरा मारग जिस […]