हम रहे न हम
चित भी उसकी पट भी उसकी
हमारा क्या था कुछ भी तो नहीं
वह जिधर कहता उधर चल पड़ते
जिधर कहता उधर ही बैठते
कठपुतली से बन गये थे
उसका हर इशारा ही शिरोधार्य था
अपना क्या था कुछ भी तो नहीं
अस्तित्व भी अपना ना था
तन-मन सब तो उसका ही हो गया था
उसके बगैर खुद को बेजान पाते थे
उसकी आवाज भी सुन ले तो जान में जान आती थी
वह भी जनता था हमारी कमजोरी
पर अहसान उसका कि उसने फायदा ना उठाया
अपने अस्तित्व में भी हमारा ही होना बताया | …सविता मिश्रा