ग़ज़ल
मुझको हंसने का बहाना दे दे।फिर वही वक्त पुराना दे दे।।बैठ पहलू में मेरे आकर फिर।बाद मुद्दत के रिहाना दे
Read Moreकभी व्यवस्था पर है प्रश्न उठाते,कभी संविधान की बात सुनाते।लेकिन जब “अवसर” मिलता है,वे तभी वादों को भूल भी जाते।
Read Moreतुम बिन सूना मन का आँगन,बन जाओ झंकार सखे !साँसें तुमको ढूँढ रही हैं,कर लो अब स्वीकार सखे ! मौन
Read Moreझूठ सजा दरबार में, सच खड़ा लाचार।न्याय माँगता रह गया, पीड़ित बारंबार।। मंजिल पाने की धुन में, भूला जग व्यवहार।जीत
Read Moreस्वार्थों की आँधी चली, बिखरे नेह-प्रसंग।रिश्तों के आँगन हुए, अब सूने बेरंग।। आँसू पीकर जी रहा, मन में लिए सवाल।किसको
Read Moreथाली में पकवान सजे हैं, आँखें टीवी पर अटकी,निवाला मुँह तक आता है, सुध-बुध कहीं भटकी।कभी समाचार-धारावाहिक, मूवी का शोर
Read More