हास्य व्यंग्य

हास्य-व्यंग्य : विदेश का पहनावा

विदेश में वह पढ़ी लिखी है। विदेशी हाव-भाव घुस गया है। होनहार लड़की है। विदेश में पली बढ़ी है और वहीं का पहनावा है। उस गौरवर्ण की लड़की भारत के गांवों की तरफ चली। घुटने से आठ अंगुल उपर तक पोशाक है। उसके खुलेपन पहनावे से उसकी सुंदरता में चौदहवीं का चांद नजर आ रहा था। 

पूरा माहौल दूषित होता जा रहा है। कुछ लड़कों का झुंड देख देखकर बेचारे खुद ही शर्माहट महसूस कर रहे हैं। तिरछी नजरें से देखकर आपस में फुसफुसाहट शुरू कर दी। इनका बहस चल रहा था शिक्षा पर। बेचारी के आगमन से शिक्षा पर की जा रही बहस समाप्त हो गयी।

सौंदर्यशास्त्री सब बन गये। ऐसी सुंदरता का दर्शन होता रहे तो पढ़ाई लिखाई सब इसी पर होता रहेगा। ईश्वर ने इसका दर्शन करने के लिए भेजा है। सुलभ सौंदर्य भाग्यशालियों को मिलता है। 

मास्टर जी ने देखा। उनका दिमाग चकरा गया। ऐसी सुंदरी का प्रथम आगमन से गांव का माहौल खराब हो जायेगा। देश बिगड गया है। सब गड़बड़ है। 

गांव की औरतों ने तंज कसा। इसे शहर की हवा लग गयी है। ऐसे चलेगी तो गांव के सब छोरे बर्बाद हो जायेंगे। इसकी अक्ल मर गयी है। दिनदहाड़े फिलिम की शूटिंग करने चल दी। यही सब देखकर हमरे लड़कवा का मन पढ़ने में नहीं लगता है। 

सब पलट-पलट कर देखकर रहे हैं। भारतीय संस्कृति अब फल फूल रही है। पूर्ण विकास की ओर अग्रणी है। जमाना शार्टकट का गया है। बेचारी का कोई दोष नहीं है। सब विदेश से आयातित है। 

— जयचन्द प्रजापति ‘जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com

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