कविता

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सुबह का अखबार,शाम को रद्दी हैदेखो देखो,तुम्हारी भाषा कितनी भद्दी हैसुर्खियों में चीखें, भीतर सन्नाटाचहुंओर छाया, कैसा गन्नाटाआंकड़ों की चादर,

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