पुस्तक समीक्षा

जीवन जैसा जिया : एक महान व्यक्ति की आत्मकथा

‘जीवन जैसा जिया’ पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की आत्मकथा है I यह आत्मकथा दस अध्यायों में विभक्त है I चंद्रशेखर जी ने अपनी आत्मकथा में राजनीति के घात-प्रतिघात, उथल-पुथल, आरोह-अवरोह और नैतिक मूल्यों की गिरावट के बारे में खुलकर अपने विचार व्यक्त किए हैं I इस आत्मकथा से राजनीति के अनेक अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं I उनके गाँव इब्राहिम पट्टी से आत्मकथा का आरंभ होता है और अंत ‘जीवन जैसा जिया’ से होता है जिसमें उन्होंने अपना जीवन निष्कर्ष व्यक्त किया है I चंद्रशेखर विलक्षण प्रतिभा के धनी थे I वे प्रखर समाजवादी और प्रभावशाली वक्ता थे I संसद में दिए गए उनके भाषणों से उनकी वक्तृत्व कला और गहन ज्ञान का पता चलता है I राजनीतिशास्त्र के छात्र और अनुसंधानकर्ता संसद में दिए गए उनके भाषणों से बहुत कुछ सीख सकते हैं I चंद्रशेखर ने अपनी आत्मकथा में अपने गाँव के उन सभी लोगों को याद किया है जिनसे उनका किसी न किसी रूप में संबंध था I आत्मकथा के पहले अध्याय का शीर्षक ‘इस तरह शुरू हुआ जीवन’ है I इस अध्याय में उन्होंने अपने बचपन, स्कूली शिक्षा, पिता और माँ के व्यक्तित्व, विवाह, राजनैतिक जीवन की शुरुआत आदि का वर्णन किया है I बलिया जिले में स्थित इब्राहिम पट्टी उनका गाँव है, लेकिन 17  अप्रैल 1927 को अपने ननिहाल कचुअरा नामक गाँव में उनका जन्म हुआ था I इब्राहिम पट्टी गाँव के नामकरण के संबंध में उन्होंने लिखा है कि किसी नवाब का इब्राहिम नामक एक करिंदा था जिसने अपने नाम पर उस गाँव का नाम रख दिया था I उनके पिताजी सदानंद सिंह गुस्सैल स्वभाव के व्यक्ति थे, लेकिन ईमानदार और स्पष्टवादी थे I इसलिए आसपास के लोग उनसे बहुत प्यार करते थे I उनकी माँ का नाम दुरपाती था जो उनके पिताजी की दूसरी पत्नी थीं I आत्मकथा के दूसरे अध्याय का शीर्षक ‘समाजवाद के लिए संघर्ष’ है I चंद्रशेखर जी सच्चे अर्थों में समाजवादी थे I समाजवादी मूल्यों और विचारों के प्रति उनकी गहरी निष्ठा थी I वे आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे, लेकिन इन दोनों समाजवादियों से उनकी विचारधारा थोड़ी पृथक भी थी I वे एक मौलिक विचारक थे और समाज के प्रति उनकी अटूट निष्ठा थी I दूसरे अध्याय में चंद्रशेखर जी ने जयप्रकाश नारायण से अपनी प्रथम मुलाकात, छात्र जीवन के बाद की स्थिति, दाढ़ी रखने की कहानी, पी-एच.डी. नहीं करने की प्रेरणा, डॉ राममनोहर लोहिया से पहली मुलाकात आदि का वर्णन किया है I जून 1951 में जयप्रकाश नारायण से उनकी पहली मुलाकात हुई I जयप्रकाश नारायण चंद्रशेखर जी से हमेशा भोजपुरी में बातचीत करते थे I इस अध्याय में चंद्रशेखर जी ने अपने कटु अनुभवों का बयान किया है जो आज भी प्रासंगिक है-‘’1951 में विश्वविद्यालय छोड़ने के बाद मैं सोशलिस्ट पार्टी में पूरा समय देकर काम करने लगा I……..वे बड़ी कठिनाई के दिन थे I कोई पूछनेवाला नहीं I पार्टी में अधिकतर बड़े वकील थे, पैसे वाले थे I पार्टी को ख्याति प्राप्त करने का साधन मानते थे I दिन-रात गरीबों, मजदूरों और किसानों के बीच काम करनेवाले कार्यकर्ताओं के लिए उनके यहाँ कोई स्थान नहीं था I मैं पुस्तक पढ़कर और गरीबी का अनुभव करके इस विश्वास से पार्टी में आया था कि गरीबों को इज्जत की जिंदगी दिलाने में पार्टी अगुआई करेगी, पर वास्तविकता कुछ और दिखाई पड़ी I” इस अध्याय में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के परमाणु परीक्षण की तर्कसंगत आलोचना की है I उन्होंने लिखा है-‘’परमाणु परीक्षण से पहले हम पाकिस्तान से चार-पाँच गुना बड़ी सामरिक ताकत थे I अब हम दोनों बराबर हो गए हैं I अंतर इतना ही है कि पहले वे हमको बर्बाद करेंगे या हम उनको बर्बाद करेंगे I किसी को बर्बाद करने की हमारी परंपरा नहीं है I इसे भी ध्यान में रखना चाहिए I और फिर वही हुआ I सारी दुनिया फिर प्रशंसा करने लगी कि बड़े संयम का परिचय दे रहा है भारत I इसे हमने कुटनीतिक विजय की संज्ञा दी I हमारे जवान बलिदान देते रहे, लेकिन हमने सीमा पार नहीं की, जो सामरिक दृष्टि से शायद जरूरी था I आखिर हम लोग कितनी बार भूलें करेंगे और कितनी बार इन सवालों को उठाएंगे ?”

   आत्मकथा के तीसरे अध्याय का शीर्षक ‘’कांग्रेस में’’ है जिसमें चंद्रशेखर जी ने कांग्रेस पार्टी में बिताए अपने अनुभवों का बयान किया है I इस अध्याय में वर्ष 1969 के राष्ट्रपति चुनाव, ललित नारायण मिश्र की उदारता और दुखद अंत, इंदिरा गाँधी और राजनारायण के व्यक्तित्व का वर्णन किया गया है I उन्होंने लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु के संबंध में व्याप्त अफवाहों और दंतकथाओं का खंडन किया है I उन्होंने लिखा है-‘’शास्त्री जी की मृत्यु के बारे में कुछ लोगों को संदेह है कि वह स्वाभाविक मृत्यु नहीं थी, लेकिन मैं इस तथ्य में कोई सच्चाई नहीं देखता I दिल का दौरा उन्हें पहले भी पड़ चुका था I इससे तो अचानक मृत्यु होती ही है I उस समय यह बात भी उछाली गई कि शास्त्री जी की अचानक मृत्यु में इंदिरा गाँधी और सोवियत संघ की सांठ-गाँठ थी I यह बात बेबुनियाद है क्योंकि सोवियत संघ उस समय ऐसा कोई कदम क्यों उठाता ?” चंद्रशेखर जी निम्न मध्यम वर्ग की ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए थे I इसलिए सांसद बनने के बाद भी निम्न मध्यवर्गीय संस्कार उनका पीछा कर रहा था I वे जब राज्यसभा सदस्य बनकर 1962 में दिल्ली आए तो घबराए रहते थे I उन्होंने लिखा है-‘’मुझे अशोका होटल जाने से डर लगता था I कहीं काँटा या चम्मच गलत तरीके से न पकड़ लूं I थोड़े ही दिनों में मुझे प्रमुख सदस्यों के बीच जाने का मौका मिलने लगा, क्योंकि संसद में मैं अपनी बातें बिना हिचक कहने लगा था I” 1971 के ‘गरीबी हटाओ’ नारे के पाखंड पर भी उन्होंने प्रहार किया है I इंदिरा गाँधी ने गरीबी हटाओ का नारा तो दे दिया, लेकिन इसके प्रति उनकी निष्ठा नहीं थी I चुनाव में विजयी होने के उपरांत उन्होंने पूंजीपतियों के संगठन में जो भाषण दिया वह इस नारे के प्रतिकूल था I पुस्तक के चौथे अध्याय ‘बिहार आंदोलन और आपातकाल’ में चंद्रशेखर जी ने मोरारजी देसाई के अनशन, बिहार आन्दोलन और आपातकाल की ज्यादतियों का वर्णन किया है I वे स्पष्ट वक्ता थे, कुछ भी छिपाते नहीं थे चाहे उसका परिणाम कुछ भी हो I उनमें सच बोलने का साहस भी था और समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता भी I उन्होंने अंग्रेजी के प्रति भारतवासियों के लगाव और मानसिकता पर भी बेबाक टिप्पणी की है-‘’मैंने कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ जी से चंद मिनट बोलने की इजाजत माँगी I उस समय सारी चर्चा अंग्रेजी भाषा में चल रही थी I आज़ादी के बाद यह जेहनियत कुछ अधिक प्रबल हो गई है I हम लोग भावुकता भरे गुस्से में अंग्रेजी बोलने लगते हैं I शायद मन के कोने में कहीं यह धारणा रहती है कि इसका असर कुछ ज्यादा होगा I मैंने भी अंग्रेजी में ही बोलना प्रारंभ किया और पहले ही वाक्य में मैंने यह कहा कि दीक्षित जी, आप पिछले पंद्रह-बीस वर्षों से मुझे जानते हैं I मुझमें और बहुत सारी कमी हो सकती है, पर साहस की कमी नहीं है I” चंद्रशेखर जी के पास पैसे का हमेशा अभाव रहता था I वे अपने मित्रों से माँगकर अपना काम चलाते थे I कभी ललित नारायण मिश्र उनकी मदद करते थे तो कभी कोई अन्य मित्र I उन्होंने आत्मकथा में आपातकाल के अपने कारावास का भी वर्णन किया है I उन्होंने राजनीति की गिरावट और नेताओं के नैतिक पतन को भी रेखांकित किया है I उन्होंने लिखा है कि इंदिरा गाँधी जगजीवन राम को पसंद नहीं करती थीं, केवल उनका इस्तेमाल करती थीं I

   आत्मकथा के ‘’जनता पार्टी और सरकार का गठन’’ शीर्षक पाँचवे अध्याय में चंद्रशेखर जी ने जेल से अपनी रिहाई, जनता पार्टी का अध्यक्ष बनने का प्रसंग, उत्तर प्रदेश विधानसभा के टिकट के लिए मारामारी, जनता पार्टी की टूट, श्रीमती गाँधी की गिरफ़्तारी आदि घटनाओं का चित्रण किया है I उन्होंने मोरारजी देसाईं के अड़ियल स्वभाव का वर्णन किया है I मोरारजी किसी बात पर अड़ जाते थे I इसलिए जयप्रकाश नारायण को चंद्रशेखर जी ने सलाह दी थी कि किसी को प्रधानमंत्री बना दीजिए, लेकिन मोरारजी को नहीं बनाइए I उन्होंने जयप्रकाश नारायण से कहा-‘’तरह-तरह के लोग हैं इस पार्टी में I उन्हें एक साथ वही रख सकता है जो लोगों की बात सुनकर उन्हें साथ ले चलने के लिए थोड़ा समझौता कर सके I मोरारजी भाई अलग तरह के आदमी हैं I वे अपनी बात पर अड़े रहेंगे, पार्टी के लिए परेशानी होगी और सरकार भी टूट जाएगी I मेरी राय थी कि जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाना चाहिए I’’ बाद में चंद्रशेखर जी की भविष्यवाणी सच हुई I पार्टी भी टूट गई और सरकार भी असमय गिर गई I इसी अध्याय में उन्होंने चौधरी चरण सिंह की राजनैतिक हैसियत का भी आकलन किया है I उन्होंने लिखा है कि चौधरी चरण सिंह केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेता थे, उनका अखिल भारतीय व्यक्तित्व नहीं था I कुछ अटपटे विचारों को वे पाले रहते थे I आत्मकथा के छठे अध्याय ‘’जनता पार्टी का बँटवारा और भारत यात्रा’’ में चंद्रशेखर जी ने सारनाथ सम्मेलन, भारत यात्रा के उद्देश्यों, अपने स्वास्थ्य की गड़बड़ी, रामकृष्ण हेगड़े के मुख्यमंत्री बनने, इंदिरा गाँधी की हत्या आदि घटनाओं का वर्णन किया है I आत्मकथा के सातवें अध्याय ‘’जनता दल का दौर’’ में चंद्रशेखर जी ने बोफोर्स मामला, जनता दल के गठन, जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाए जाने आदि घटनाओं का वर्णन किया है I वे राजनैतिक गिरावट के लिए विश्वनाथ प्रताप सिंह को जिम्मेदार मानते थे I उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए बोफोर्स का मुद्दा उठाया I चंद्रशेखर जी ने लिखा है-‘’विश्वनाथ प्रताप सिंह से नीति स्तर पर मेरा मतभेद बना हुआ था I आर्थिक नीति हो या उद्योग नीति, कश्मीर का सवाल हो या बाबरी मस्जिद, हर सवाल पर मेरा दृष्टिकोण अलग था I विश्वनाथ प्रताप सिंह का उदय राजनीति में फिसलन की शुरुआत थी I भ्रष्टाचार के मुद्दे को उन्होंने भावनात्मक बना दिया I जब जनता को किसी मुद्दे पर भावनात्मक बना दिया जाता है तो तर्क की गुंजाइश कम हो जाती है I लेकिन भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए जो संस्थात्मक व्यवस्थाएं होनी चाहिए उसे सरकार में आने के बाद बनाने की चिंता नहीं थी I’’

   आत्मकथा का आठवाँ अध्याय ‘’प्रधानमंत्री के रूप में’ चंद्रशेखर के कटु-मधु अनुभवों का अनोखा दस्तावेज है I इसमें उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के पतन, अपनी प्राथमिकताओं, अयोध्या विवाद, पंजाब समस्या, अपनी सरकार के पतन, राजीव गाँधी की हत्या का वर्णन किया है I उन्होंने इस अध्याय में बताया है कि उन्होंने सरकार बनाने का दायित्व क्यों ग्रहण किया I उन्होंने अपने जीवन की विडम्बनाओं के बारे में लिखा है-‘’मेरे जीवन की एक अजीब विडम्बना है I इस पर मैंने काफी आत्मविवेचन किया है, लेकिन मुझे कोई उत्तर आज तक नहीं मिल पाया है I मैंने कभी किसी के विरुद्ध व्यक्तिगत कारणों से आज तक आक्षेप नहीं किया है और न ही आरोप लगाया है I मैंने इस बात की कभी परवाह नहीं की कि कौन व्यक्ति किस पद पर है I लेकिन लोगों को मुझसे घबराहट होती रहती है, मेरी समझ में यह नहीं आता कि ऐसा क्यों है ?” उन्होंने प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने के बारे में स्पष्ट रूप से लिखा है I उन्होंने विश्वनाथ प्रताप सिंह की खतरनाक नीतियों से देश को बचाने के लिए प्रधानमंत्री का पद स्वीकार किया था I उन्होंने लिखा है-‘’उस समय वीपी की सरकार देश को जिस रास्ते पर ले जा रही थी वह खतरनाक रास्ता था I उससे देश विनाश की ओर जा रहा था I मैं उसे बदल सकता हूँ, इसका विश्वास मुझे था I तात्कालिक समस्याओं का हल असंभव नहीं लगा I मेरी धारणा को बल मिला I मैं चार महीने पूरी तरह और तीन महीने कामचलाऊ प्रधानमंत्री रहा I इन सात महीनों में मैंने महसूस किया कि प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी या काम इतना बड़ा नहीं है कि इस पद पर आसीन व्यक्ति के पास दूसरे कामों के लिए बिल्कुल समय न हो I” चंद्रशेखर जी का अपना जीवन दर्शन था I वे हमेशा समाज और देश हित को ध्यान में रखकर निर्णय लेते थे I उन्होंने इस अध्याय में जीवन के गूढ़ तथ्यों को रेखांकित किया है-‘’जीवन के बारे में मेरा शुरू से एक दृष्टिकोण रहा है I उसे सरकार पर भी लागू करना होगा, ऐसा मेरा विचार है I जीवन अपने हाथ में नहीं है I अपने वश में कर्म है I जीवन लम्बा चल सकता है, वह कल भी समाप्त हो सकता है I दोनों स्थितियों में मैं यह मानता हूँ कि कोई व्यक्ति इतिहास का आखिरी व्यक्ति नहीं है I वह सारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता I जितना हो सके, उतना पूरी लग्न से प्रयास करना चाहिए I”

   आत्मकथा के ‘’75वें पड़ाव तक’’ शीर्षक नवें अध्याय में चंद्रशेखर जी ने समाजवादी जनता पार्टी के गठन का विवेचन किया है I आत्मकथा के इस अध्याय में उन्होंने उदारीकरण के संबंध में अपने विचार प्रस्तुत किए हैं तथा अपने संसदीय जीवन का सिंहावलोकन किया है I जीवन के अंतिम पड़ाव पर वे राजनीति के पतन से दुखी थे I राजनेता लोगों की भावनाओं को भड़काकर अपनी रोटियाँ सेंक रहे थे I राजनीति में सामाजिक मूल्यों का ह्रास हो रहा था I इससे दुखी होकर उन्होंने लिखा है-‘’राजनीति की पुरानी मान्यताएं बदल गई हैं I अब तो भीड़ की राजनीति हो गई है I लोगों ने यह समझ लिया है कि जनतंत्र का मतलब है, किसी तरह से जन समर्थन जुटा लो-चाहे इसके लिए जो भी करना पड़े I ऐसी परिस्थिति में मैं उदासीन हो गया I मैंने राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप बंद कर दिया I’’ संसद में बहस के गिरते स्तर से वे दुखी थे I उन्होंने लिखा है-‘’गाँव और संसद की बहस में अब कोई अंतर नहीं रहा I गाँव में कम से कम लोगों की पीड़ा की चर्चा तो होती है, संसद तो उससे भी दूर होती जा रही है I’’ चंद्रशेखर जी अपने विचारों पर अडिग रहनेवाले विरले राजनेता थे, लेकिन भारतीय राजनीति की गिरावट से उनका मन खिन्न रहता था I वे आचार्य नरेंद्र देव की प्रेरणा से राजनीति में आए थे I उन्होंने कभी यह चिंता नहीं की कि उनकी बात कोई सुनेगा या नहीं I उन्होंने लिखा है-‘’मैं जानता हूँ कि कोई व्यक्ति इतिहास का आखिरी व्यक्ति नहीं होता I मैंने सब चीजों को ठीक करने की जिम्मेदारी नहीं ली है I मुझे अपने फैसलों पर कोई अफ़सोस नहीं है I हाँ, यह भी जानता हूँ कि कई फैसले गलत थे I ऐसा कोई आदमी अगर है तो मैं उससे मिलना चाहूँगा जिसने कोई गलती न की हो I”

   आत्मकथा के अंतिम अध्याय ‘’मुश्किल है जिन्हें भूलना’’ में चंद्रशेखर जी ने उन सभी छोटे-बड़े लोगों को याद किया है जिनसे उनका संबंध रहा है I उन्होंने अपने गाँव के उन सभी अज्ञात-अख्यात लोगों का स्मरण किया है जिनसे बचपन में उनका जुड़ाव था I चंद्रशेखर जी ने मौसी के बेटे अनिरुद्ध सिंह, रामनरेश काका, बल्ली काका, रामकठिन काका, पैजनिया फूआ, मेवा लोहार, झींगुर दर्जी, रहीमुल्लाह पहलवान, देवनारायण भइया आदि का स्मरण किया है जिससे उनके विराट व्यक्तित्व का परिचय मिलता है I बड़े लोगों को तो सभी याद करते हैं, लेकिन महान वह है जो छोटे से छोटे व्यक्ति को भी याद करे I उन्होंने अपने आन्दोलन के साथियों और इलाहबाद विश्वविद्यालय के मित्रों को भी याद किया है I उन्होंने अंत में अपने जीवन का सार और जीवन दर्शन प्रस्तुत किया है-‘’मंजिल की तलाश में चलता रहा, देश बनाने की तमन्ना दिल में लिए, कितने जोखिम भरे अवसरों से गुजरा, कितने ऐसे मुकाम आए जब मंजिल सामने आती दिखाई पड़ी, पर फिर वही उधेड़बुन, वही ईर्ष्या-द्वेष ! विवादों से बचने के प्रयास का परिणाम निकला एक उलझन भरा जीवन I देश को निकट से देखा-समझा I उच्च स्थानों पर आसीन लोगों के क्रियाकलापों को देखने-परखने का अवसर मिला I” चंद्रशेखर जी ने अपनी आत्मकथा ‘जीवन जैसा जिया’ में जीवन के गूढ़तम रहस्यों और निष्कर्षों को आसान भाषा में प्रस्तुत कर दिया है I इस आत्मकथा के अध्ययन के बिना चंद्रशेखर जी जैसे विराट व्यक्तित्व का आकलन नहीं किया जा सकता है I

पुस्तक-जीवन जैसा जिया (आत्मकथा)

लेखक-चंद्रशेखर

प्रकाशक-राजकमल पेपरबैक्स

पाँचवाँ संस्करण-2023

पृष्ठ-218   

*वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम+पोस्ट-जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :1.अरुणाचल का लोकजीवन 2.अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य 3.हिंदी सेवी संस्था कोश 4.राजभाषा विमर्श 5.कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय 6.हिंदी : राजभाषा, जनभाषा,विश्वभाषा 7.पूर्वोत्तर भारत : अतुल्य भारत 8.असम : लोकजीवन और संस्कृति 9.मेघालय : लोकजीवन और संस्कृति 10.त्रिपुरा : लोकजीवन और संस्कृति 11.नागालैंड : लोकजीवन और संस्कृति 12.पूर्वोत्तर भारत की नागा और कुकी–चीन जनजातियाँ 13.उत्तर–पूर्वी भारत के आदिवासी 14.पूर्वोत्तर भारत के पर्व–त्योहार 15.पूर्वोत्तर भारत के सांस्कृतिक आयाम 16.यतो अधर्मः ततो जयः (व्यंग्य संग्रह) 17.मणिपुर : भारत का मणिमुकुट 18.उत्तर-पूर्वी भारत का लोक साहित्य 19.अरुणाचल प्रदेश : लोकजीवन और संस्कृति 20.असम : आदिवासी और लोक साहित्य 21.मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य 22.पूर्वोत्तर भारत : धर्म और संस्कृति 23.पूर्वोत्तर भारत कोश (तीन खंड) 24.आदिवासी संस्कृति 25.समय होत बलवान (डायरी) 26.समय समर्थ गुरु (डायरी) 27.सिक्किम : लोकजीवन और संस्कृति 28.फूलों का देश नीदरलैंड (यात्रा संस्मरण) I मोबाइल-9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com

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