गलियारे : नौकरशाही की पतन गाथा
अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के लिए नौकरशाही का एक तंत्र विकसित किया था I यहाँ के लोगों को दास बनाकर रखना ही उनका उद्देश्य था I 1947 में अंग्रेज चले गए, देश आज़ाद हो गया, लेकिन अंग्रेजों द्वारा निर्मित नौकरशाही का ढाँचा आज भी बदस्तूर कायम है I गोरे नौकरशाहों की जगह काले नौकरशाह पदासीन हो गए हैं, लेकिन उनकी मानसिकता अंग्रेजों जैसी ही है I वे तन से तो भारतीय हैं, लेकिन मन से पूरे अंग्रेज हैं I अंग्रेज भारत के लोगों को आदमी नहीं समझते थे I आज़ादी के अठहत्तर वर्षों के बाद भी भारत के नौकरशाह अधीनस्थ कर्मचारियों और आम जनता को इंसान नहीं समझते हैं I सरकारी कार्यालयों में ईमानदार और संवेदनशील अधिकारियों का दम घुटता है I नौकरशाही का भ्रष्ट तंत्र व्यक्ति को बेईमान बना देता है I नौकरशाही का अंग बनने के बाद भी जो भ्रष्ट नहीं होते हैं नौकरशाही उनका जीवन तबाह कर देती है I हिंदी के वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चंदेल का उपन्यास ‘गलियारे’ भारत की पतित नौकरशाही की सड़ांध को उजागर करता है I उपन्यास पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है कि उपन्यासकार ने हमारी आँखों के सामने प्रतिदिन घटित होनेवाली घटनाओं को शब्दों की कमीज पहना दी है I नौकरशाही की निर्मम चक्की सुधांशु जैसे ईमानदार और संवेदनशील अधिकारियों को प्रताड़ित करती है, उन्हें तोड़ती-तड़पाती है और अंततः उसकी जान ले लेती है I अंग्रेज अधिकारियों जैसा ही आज के भारतीय नौकरशाहों का चाल-चरित्र है I वही मक्कारी, वैसा ही शोषण-चक्र और वही लंपटपना I कम से कम अंग्रेज अधिकारी अपने देश ब्रिटेन की भलाई के बारे में तो सोचते थे, लेकिन आज़ाद भारत के नौकरशाह जनता के धन पर ऐयाशी करते हैं, जनता और जनता के हित से उन्हें कोई मतलब नहीं है I वे नैतिक रूप से पतित हो चुके हैं, उन्हें देश और देशहित की कोई चिंता नहीं I वे केवल अपने बारे में सोचते हैं I ‘गलियारे’ नौकरशाही के छल-छद्म, अहंकार, स्वार्थपरकता, धनलिप्सा, रिश्वतखोरी, नैतिक गिरावट का जीवंत दस्तावेज है I ‘गलियारे’ पढ़ते हुए लगता है कि हम नौकरशाही के किसी ऐसे बजबजाते गलियारे से गुजर रहे हैं जहाँ बदबू, सड़ांध और बेहया दबंगई है I नौकरशाही आज़ाद भारत का ऐसा गलियारा है जहाँ मानवाधिकार दम तोड़ देता है और सरकार की जनहितैषी नीतियों का जनाजा निकल जाता है I सुधांशु जैसे दो-चार ईमानदार अधिकारी इस गलियारे की सफाई नहीं कर सकते हैं I नौकरशाही के इस जनविरोधी गलियारे के पूरे तंत्र का बदलाव करना आवश्यक है अन्यथा यह सुधांशु जैसे निष्ठावान नौकरशाहों की बलि लेता रहेगा I सुधांशु भ्रष्ट नौकरशाही के बारे में सोचता है-
‘भ्रष्ट और रिश्वतखोर एक-दूसरे को तुरंत पहचान लेते हैं I वे एक ही गलियारे से गुजरनेवाले राही होते हैं……गलियारे जो देश को पतन के अंधकार तक ले जा रहे हैं I गलियारे जहाँ पाल जैसे लोग सुरक्षित और आश्वस्त हैं I ये आज़ादी के बाद का वह इतिहास रच रहे हैं जिसकी कल्पना गाँधी, सुभाष, भगत सिंह और उनके साथियों ने नहीं की थी I’ सुधांशु की त्रासदी लाखों ईमानदार अधिकारियों की त्रासदी है I
‘गलियारे’ में भारत की शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न उठाया गया है I देश में शिक्षा व्यवस्था की स्थिति बदहाल है I भारत के विश्वविद्यालय बेईमानी, पक्षपात और भ्रष्टाचार के द्वीप बन चुके हैं जहाँ एक से बढ़कर एक गुरुघंटाल और मेधाहीन प्रोफ़ेसरों का वर्चस्व स्थापित है I प्रोफेसरों की नियुक्ति में न कोई पारदर्शिता है, न ईमानदारी I विश्वविद्यालयों में शोध और नियुक्ति के नाम पर लड़कियों का देह शोषण और लड़कों का आर्थिक शोषण एक खुला सच है I उपन्यास के आरंभ में विश्वविद्यालय की नारकीय और भ्रष्ट व्यवस्था की कलई खोली गई है I शिक्षा के बारे में विष्णुपुराण में कहा गया है-‘सा विद्या या विमुक्तये अर्थात ज्ञान वह है जो व्यक्ति को मोह, दुःख और अज्ञान से मुक्त करता है, लेकिन भारत की शिक्षा व्यवस्था बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि के दलदल में फँस गई है I विश्वविद्यालय देह शोषण, लंपटता एवं भ्रष्टाचार के केंद्र बन गए हैं I शांतिकुमार ने कहा-‘शायद ही कोई ऐसा प्राध्यापक इस विश्वविद्यालय या कॉलेज में होगा जिसके पीछे सिफारिश न रही हो I कोई कितना ही प्रतिभाशाली क्यों न हो…..गोल्डमेडलिस्ट हो….फिर भी यदि उसका कोई गॉडफादर यहाँ नहीं है तो उसे सरकारी-गैरसरकारी बाबूगिरी के लिए ही तैयार रहना चाहिए I’’ शान्तिकुमार का यह कथन भारत की शिक्षा व्यवस्था का पोस्टमार्टम करने के लिए पर्याप्त है I
यह गौर करने लायक तथ्य है कि छात्र जीवन में ईमानदारी और देशभक्ति की बातें करनेवाला व्यक्ति नौकरशाही का अंग बनते ही कैसे भ्रष्ट बन जाता है I इसका सबसे बड़ा कारण अंग्रेजों का बनाया हुआ तंत्र है I नौकरशाहों का प्रशिक्षण, नियुक्ति प्रक्रिया, अधीनस्थ कर्मचारियों को गुलाम समझने की प्रवृत्ति सब कुछ यथावत है, कुछ भी बदला नहीं है I आईएएस खुद को ईश्वर का दूत और सर्वज्ञानी समझते हैं I यह विशिष्टता-बोध उन्हें आम जनता से घुलने-मिलने नहीं देता I आज़ादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी अफसरशाही का आतंक इस कदर हावी है कि बाबू और चपरासी इनके सामने अपने को दयनीय समझते हैं I भारतवासी गर्वपूर्वक कहते हैं कि हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह लोकतंत्र नौकरशाही और लालफीताशाही के नीचे हांफ रहा है I इस झूठे लोकतंत्र में ईमानदार लोगों का दम घुट रहा है I देश का लोकतंत्र नेताओं, नौकरशाहों और पूंजीपतियों का गुलाम है I अच्छा खासा इंसान भी नौकरशाह बनने के बाद इंसानियत भूल जाता है I भारत की लालफीताशाही के बारे में शुभांगी कहती है कि अधिकांश ब्यूरोक्रेट इंसान नहीं रह पाते I नौकरशाहों की पाखंडी दुनिया में सुधांशु जैसे गाँव के भोले-भाले और ईमानदार युवक का दम घुटने लगता है I ईमानदार और निष्ठावान व्यक्ति भारत की नौकरशाही में मिसफिट हो जाता है I दिनेश सिन्हा, डी.पी.मीणा, पाल जैसे बेईमान और भ्रष्ट लोगों के लिए भारत की नौकरशाही स्वर्ग है I राजनेता, नौकरशाह और उद्योगपति मिलकर जनता के साथ छल करते हैं, लेकिन इनको कोई दंडित करनेवाला नहीं है I
दिनेश सिन्हा, डी.पी.मीणा आदि अधिकारी सरकारी दफ्तरों को लड़कीबाजी का अड्डा बना देते हैं I कुमुदिनी, प्रीति, जुही जैसी लडकियाँ चाहे-अनचाहे उनका बिस्तर गर्म करती रहती हैं I इन भ्रष्ट नौकरशाहों के शब्दकोश में नैतिकता का कोई स्थान नहीं है I जुही को देखते ही मीणा के मुख से लार टपकने लगता है और वह उसके साथ अपना बिस्तर गर्म करने की योजना बना लेता है-‘’मीणा ने रात दस बजे अमन अरोड़ा को फोन कर कहा कि जुही रात उसके यहाँ रहेगी और सुबह पाँच बजे वह उसे उसके घर छोड़ जाएगा I अरोड़ा ने मीणा की बात केवल सुनी, प्रतिक्रिया देने का साहस उसमें नहीं था I रातभर वह जागता रहा और सोचता रहा कि जुही को सेक्शन अफसर बनवाने के लिए उसे इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी यह उसने कभी नहीं सोचा था और अब जब फंदा उस पर कसा जा चुका है तब वह उसे काटने का साहस नहीं कर सकता I उसकी आत्मा ने उसे बार-बार धिक्कारा……नपुंसक, कापुरुष और भी न जाने क्या-क्या कहा I’’ यह नौकरशाहों का असली चरित्र है I अंग्रेज अधिकारी भी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की बीवियों का इसी तरह यौन शोषण करते थे I इसीलिए लोग नौकरशाहों को अंग्रेजों की अवैध संतान कहते हैं I
‘गलियारे’ में हिंदी के कवियों और लेखकों के नकली घटाटोप पर भी प्रहार किया गया है I नौकरशाहों की तरह शराब, भ्रमण और पैसे के लिए लार टपकाते इन लेखकों-कवियों की नैतिकता पाताल में जा चुकी है I दिनेश सिन्हा की कविताएँ घटिया होने के बावजूद हिंदी के लेखक-कवि शराब के लोभ में उनकी झूठी वाहवाही करते रहते हैं I अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए नौकरशाह दूसरों की रचनाएँ अपने नाम से प्रकाशित करा लेते हैं I हिंदी के साहित्यकार चंद पैसे और शराब के लिए बिकने को तैयार रहते हैं I सुकांत ने कवियों की गिरावट के बारे में ठीक ही कहा-‘‘हम जैसे कवियों को मुफ्त की पीने को जहाँ भी मिलती है वहाँ जाने से परहेज नहीं….पिलानेवाले के चरित्र से हमें क्या…..हमें पीने-खाने से मतलब I अपनी औकात जेब से खरीदकर पीने की नहीं, सो महीने में तीन-चार बार जहाँ भी मुफ्त की मिली चले गए…..उस व्यक्ति के चरित्र की ओर से आँखें बंद कर पिया-खाया और चले आए…..भाड़ में जाए वह और उसका साहित्य I’’ हिंदी साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग घोर भोगवादी, ह्रदयहीन और नशेड़ी है I
प्रशिक्षण अवधि में ही नौकरशाहों को विशिष्टता-बोध का ओवरडोज दे दिया जाता है I उन्हें बताया जाता है कि वे अन्य लोगों से विशिष्ट, महान और प्रतिभाशाली हैं I वे देश के हाथ-पैर हैं I उन्हें आम जनता से अलग रहना चाहिए I वे एक विशेष वर्ग के प्रतिनिधि हैं I आम जनता से उन्हें घुलमिलकर नहीं, अलग रहना चाहिए I देश का दुर्भाग्य है कि जिस जनता की सेवा करने के लिए इन नौकरशाहों की नियुक्ति होती है उससे इनका कोई संपर्क नहीं होता I इसलिए जनसेवा के लिए बनी योजनाएं विफल हो जाती हैं I नौकरशाह अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के सामने तो शेर बनते हैं, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के सम्मुख रेंगने लगते हैं I
प्रीति एक महत्वाकांक्षी, भावनाहीन और भौतिकतावादी लड़की है I वह अल्प समय में ही नौकरशाही की पतित व्यवस्था का अंग बन जाती है I इसलिए अपने पति सुधांशु से उसका टकराव होता रहता था I पति और पत्नी दोनों दो ध्रुव पर खड़े थे I सुधांशु स्वयं को जनता का सेवक समझता था, परंतु प्रीति अपने को मालिक समझती थी एवं अधिकारों का दुरूपयोग करती थी I अन्य नौकरशाहों को भ्रष्ट होने में कुछ समय लगता है, लेकिन प्रीति प्रथम दिन ही भ्रष्टाचार के दलदल में धँस चुकी थी I वह सुधांशु की सच्चाई, ईमानदारी, सरलता और पाखंडहीनता को बकवास समझती थी I प्रीति के चरित्र में आए बदलाव को सुधांशु ने भाँप लिया था I वह कहता है-
‘’मैं अनुभव कर रहा हूँ कि कल तक आदर्श की बातें करनेवाली तुम अब उसी ब्यूरोक्रेसी का हिस्सा बनती जा रही हो जो जनता के धन का दुरूपयोग कर रही है I’’
उपन्यासकार ने गलियारे में एक नया प्रयोग किया है I कथा को आगे बढ़ाने और पात्रों के विचारों को संप्रेषित करने के लिए उपन्यास में कथोपकथन के स्थान पर पात्रों की सोच को अभिव्यक्त किया है I सुधांशु के विचारों के रूप में समकालीन जीवन-जगत की सोच को प्रस्तुत किया गया है I भ्रष्टाचार के संबंध में सुधांशु की सोच अधिकांश भारतवासियों के विचारों का प्रतिबिंब है–
‘‘भ्रष्टाचार के विरुद्ध बोलना इस देश में अपराध की श्रेणी में गिना जाने लगा है I बदलते समय में अपराध की परिभाषा बदलने लगी है I जो अपराधी है वह शेर की भांति सीना ताने विचरण करने के लिए स्वतंत्र है और उसके विरुद्ध उंगली उठानेवालों को वह अपना शिकार समझता है I यह आज़ादी भी व्यवस्था ने उसे दे रखी है क्योंकि उसका संबंध सत्ता के गलियारों तक है I सत्ता……जो जनता के वोट के बल पर संसद और विधानसभाओं में काबिज होती है….वह किस प्रकार वोट के लिए नोटों का खेल खेलती है I’’ भारत में जो भ्रष्ट हैं उनकी ही पूजा की जाती है I भ्रष्टाचार भारतवासियों के रक्त में समा गया है I जिसे मौका मिलता है वह भ्रष्टाचार को गले लगा लेता है I राजनेता, पूंजीपति, नौकरशाह सभी जनता का शिकार करते हैं I भारत का तंत्र नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है I भट्ट और सुधांशु के बीच का निम्नलिखित संवाद देश में भ्रष्टाचार की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है-
‘‘ए.एफ.पी.ओ. से कौन-कौन जुड़ा है ?’’
‘सर, एक चपरासी, दो बाबू, सेक्शन अफसर…..I’
‘‘आप और मैं….I’’ सुधांशु ने घड़ी देखते हुए कहा, ‘’जी सर I’’
‘’आप घबराएं नहीं भट्ट जी….मैं नया आदमी हूँ इसलिए पूछ रहा हूँ I’’
‘’जी सर……घबड़ाने की कोई बात नहीं I’’
‘’इसके अतिरिक्त…..I’’
सर, बड़े साहब भी……I’’
‘’अच्छा I’’
‘’सर, हम न भी लेना चाहें तो भी कांट्रेक्टर्स देंगे ही….I’’
‘’क्यों ?’’ भट्ट की बात बीच में काटकर सुधांशु ने पूछा I
‘’सर, उन्हें जल्दी से जल्दी चेक चाहिए होता है I’’
‘’वह तो अपने समय पर उनके पास पहुंचते ही होंगे I’’
राजभाषा के रूप में हिंदी को स्थापित करने का दायित्व जिन विभागों, समितियों और संस्थानों को दिया गया था वे अपने दायित्वों का निर्वाह करने में पूर्ण रूप से विफल रहे हैं I परोक्ष रूप से ये विभाग ही हिंदी के शत्रु बन गए हैं I इन संस्थाओं और विभागों के कारनामों से ही हिंदी के विकास का रथ दिशाहीन हो गया है I हिंदी के नाम पर केवल झूठे आंकड़ों की बाजीगरी की जाती है I संसदीय राजभाषा समिति ने हजारों पृष्ठों की रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी, लाखों कर्मचारियों ने हिंदी का प्रशिक्षण प्राप्त कर लिया, अनुवादकों ने लाखों पृष्ठों के अनुवाद कर दिए, शब्दावली आयोग ने लाखों शब्दों का निर्माण कर दिया, लेकिन हिंदी अभी तक कार्यालय की भाषा नहीं बन सकी I अघोषित रूप से आज भी अंग्रेजी ही देश की राजभाषा बनी हुई है I हिंदी के नाम पर केवल पाखंड, झूठ, फर्जीवाड़ा और नाटक चल रहा है I संसदीय राजभाषा समिति द्वारा निरीक्षण भी एक नाटक है I हिंदी की स्थिति से सुधांशु दुखी है I वह सोचता है-‘कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की राजभाषा के साथ ऐसा होता है I चौदह सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में जाना जाता है I विचित्र विडंबना है I वर्ष में एक दिन हिंदी में काम करने की घोषणाएं की जाती हैं I अफसर से लेकर क्लर्क तक हिंदी में काम करने के संकल्प व्यक्त करते हैं I कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं I हर कार्यालय में हजारों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं केवल उस दिवस को मनाने के नाम पर I’’
‘गलियारे’ भारत की नौकरशाही का वास्तविक चेहरा सबके सामने रखता है I यह उपन्यास नहीं, एक आईना है जिसमें भारत की नौकरशाही अपना विद्रूप चेहरा देख सकती है I यह औपन्यासिक कृति नौकरशाही के चेहरे को बेपर्दा करती है I नौकरशाही के गलियारे की बदबू, घुटन, आतंक, अंधकार, पतन, सड़ांध, पाखंड, भ्रष्टाचार और जीवन मूल्यों के क्षरण को रेखांकित करनेवाले इस उपन्यास में अद्भुत रोचकता, पठनीयता और प्रवाह है I
