ग़ज़ल
खुद ही मारते हैं, और मरने भी नहीं देते,रूलाते भी हैं खुद ही, रोने भी नहीं देते। कैसा दौर आया
Read Moreआँकड़ों की नई सुबह तब होती है, जब राष्ट्र अपनी जनता को गिनना छोड़कर उसे पढ़ना शुरू करता है। भारत
Read Moreरिमझिम बरस रहे बादलपानी से भरी-भरी धरतीखेतों में मेढक बोलेसब बच्चे कागज का नाव बनातेरंग-रंग के फूल खिलेहरियाली आई उपवन
Read Moreमानसून के आगमन से उत्तर भारत में एक विशेष आकर्षण आ जाता है। सावन और तीज के दौरान हरे-भरे खेतों,
Read Moreडॉ. विजय गर्ग हर पीढ़ी अपने समय की कुछ विशेष आकांक्षाओं और सफलता के मापदंडों के साथ बड़ी होती है।
Read Moreअच्छा करके दुःख मिले, क्यों सहते हर बार।जहाँ मिले केवल व्यथा, छोड़ो वह व्यवहार॥ सच्चाई का हर घड़ी, देना नहीं
Read Moreकलम उठी तो दर्द ने, खोले अपने द्वार।मन में दबे सवाल सब, बनकर निकले प्यार॥ स्याही केवल स्याह है, भीतर
Read Moreबारिश की शाम थी। शहर के एक छोटे से कैफ़े में हर रोज़ ठीक पाँच बजे एक बुज़ुर्ग आते थे।वो
Read Moreबड़ी जोर से शेर दहाड़ा— “जंगल में मेरा है राज!”खरगोश बोला, “मिलकर रहना, आवश्यक है आज ।”हो बलवान और बुद्धिमान
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