भाषा-साहित्य

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लेखक गाँव: हिमालय में साहित्य, संस्कृति और वैश्विक संवाद का संगम

हिमालय केवल पर्वतों की शृंखला नहीं है; वह भारत की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक परंपरा, प्राकृतिक संपदा और मानवीय संवेदनाओं का

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डर के साये में “सिसकती क़लम”,साहित्य का उद्देश्य, एक निडर बेबाक आवाज़, एक निष्पक्ष दर्पण

साहित्य केवल शब्दों का ताना-बाना या अलंकारों की सजावट नहीं है बल्कि यह समाज की धड़कन, उसकी पीड़ा, उसकी आकांक्षाओं

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क़लम, रूह की गहराई और संवेदना के संवाहक : डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह ‘सहज़’

“साहित्य की असल ख़ूबसूरती उसकी सच्चाई में है, उस ज़मीर की आवाज़ में है जो बेबाक़ होकर, बिना किसी डर

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देवेन्द्र माँझी के सृजन संसार में सामाजिक चेतना

समकालीन हिंदी और उर्दू साहित्य के परिदृश्य में देवेन्द्र माँझी एक अत्यंत संवेदनशील, यथार्थवादी और लोक-चेतना से संपृक्त रचनाकार हैं।

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हमारी राजभाषा का भविष्य हमेशा जगमगाता रहेगा

हिंदी केवल अक्षरों का समुच्चय या व्याकरण के नियमों में बंधी कोई व्यवस्था नहीं है बल्कि यह हमारे भीतर धड़कते

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उच्च न्यायपालिका में हिंदी के लिए बंद दरवाजों को धक्का देना पड़ेगा

राष्ट्रपति के आदेश 1960 में यह कहा गया था कि उचित समय आने पर सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंततः हिंदी

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हिंदी दिवस : हमारी सांस्कृतिक विरासत की अद्भुत ध्वनि और हम सबकी साझा पहचान

हिंदी भारत के जनजीवन में बहती हुई वह सशक्त धारा है, जिसमें इतिहास की स्मृतियां, लोकजीवन की सहजता, साहित्य की

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