जब कमाई रिश्तों से बड़ी हो जाए
भारतीय समाज में परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि विश्वास, त्याग, साझेदारी और पारस्परिक उत्तरदायित्व की एक जीवंत
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Read Moreरिश्ते यदि हों घाव बन, बढ़े निरंतर पीर।स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥ मन के भीतर टूटते, कितने
Read Moreमत करना इंतज़ार तू, कोई आए साथ।खुद ही अपनी शक्ति बन, खुद लिख अपनी बात॥ पिता, बंधु या संगिनी, दें
Read Moreभारत आज तीव्र शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन—दो ऐसी प्रक्रियाओं के संगम पर खड़ा है, जो देश के सामाजिक, आर्थिक और
Read Moreमौन अधर पर था कभी, नयनों में थी पीर।अब स्वर बने बोलती, बदली खुद तक़दीर॥ बंधन जितने बाँधते, उतनी बढ़ती
Read Moreभारत की सांस्कृतिक पहचान केवल उसके इतिहास, भाषाओं और परंपराओं से नहीं बनती, बल्कि उन आस्था-स्थलों से भी निर्मित होती
Read Moreद्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना हुई, तब विश्व की
Read Moreरूठो चाहे उम्र भर, रख लो लाख मलाल।अपनों के सँग मत कभी, चलना कुटिल कुचाल॥साथ न चलना हो चले, अपनी-अपनी
Read Moreप्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तब वह मनुष्य की तकनीकी उपलब्धियों, आर्थिक प्रगति और प्रशासनिक दावों की वास्तविक
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