सूखती धरती, बढ़ती प्यास : जल दिवालियापन की ओर बढ़ता भारत
जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, सभ्यता, आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। मानव
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Read Moreभारत आज तीव्र शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन—दो ऐसी प्रक्रियाओं के संगम पर खड़ा है, जो देश के सामाजिक, आर्थिक और
Read Moreस्वच्छता किसी राष्ट्र का श्रृंगार नहीं, उसका चरित्र है। किसी देश की असली पहचान संसद, मेट्रो या एक्सप्रेस-वे नहीं, बल्कि
Read Moreलोकतांत्रिक समाज में प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का भोजन करने की स्वतंत्रता प्राप्त है। यह स्वतंत्रता व्यक्तिगत गरिमा और
Read Moreजंगलों से उठती आह अब गांवों की दहलीज तक सुनाई देने लगी है। आधी रात खेतों में उतरते हाथी, बस्तियों
Read Moreप्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तब वह मनुष्य की तकनीकी उपलब्धियों, आर्थिक प्रगति और प्रशासनिक दावों की वास्तविक
Read Moreभारत में मानसून केवल एक ऋतु नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल-संसाधनों और जनजीवन की धुरी है। सदियों
Read Moreउत्तर प्रदेश में गर्मी से परेशान लोगों के लिये जल्द अच्छी खबर आने वाली है। यूपी में मानसून 27 से
Read Moreसभ्यताओं का भविष्य केवल संसदों में नहीं, खेतों की मिट्टी, जंगलों की हरियाली और जलस्रोतों की जीवनधारा में भी लिखा
Read Moreपर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत ने भूमि बहाली के क्षेत्र में एक ऐसी अभूतपूर्व
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