एक देश, हजार दफ्तर और हर काम की एक ‘कीमत’
भारत में रिश्वत अब जेब से निकलकर व्यवस्था की आदत बन चुकी है; कई बार सामान्य नागरिक का काम बिना
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Read Moreरात अब घड़ी में आती है, शहर में नहीं। घड़ी बारह बजने का ऐलान करती है, लेकिन शहर का दिन
Read Moreआँकड़ों की नई सुबह तब होती है, जब राष्ट्र अपनी जनता को गिनना छोड़कर उसे पढ़ना शुरू करता है। भारत
Read Moreकमाल की आज़ादी है हमारी! अंग्रेज़ों को भगाने के बाद हमने गुलामी के इतने नए दरवाज़े खोल लिए कि अब
Read Moreकूड़े का कोई टुकड़ा सिर्फ कूड़ा नहीं, खासकर जब वह अस्पताल से निकला हो। उसे जमीन में दबाने से खतरा
Read Moreमक्का में सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान का रक्षा समझौता पश्चिम एशिया के बदलते सुरक्षा-समीकरण का संकेत है। 7 अगस्त
Read Moreसमय ने ऐसी करवट ली है कि अब सबसे बड़ा डर बीमारी नहीं, बल्कि उसके उपचार का भारी बोझ बन
Read Moreसमाज की संवेदनहीनता अब कोई छिपी हुई बीमारी नहीं, बल्कि खुले घाव की तरह फैल रही है। जब कोई पिता,
Read Moreसुरक्षा का तमाशा अजीब है—कटघरे में यात्री खड़ा होता है, चूक भीतर होती है। वह चुपचाप बैग खोलता है, जूते-बेल्ट
Read Moreसभ्यता का सबसे गहरा घाव किसी युद्ध, महामारी या आर्थिक संकट ने नहीं, उस चमकती स्क्रीन ने दिया है जिसे
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