केन की धारा में बहता एक सवाल : क्या इंसान भी विकास का हिस्सा है?
विकास तभी सार्थक है, जब उसकी कीमत किसी की पहचान, आजीविका और अस्तित्व न बने। आज भारत इसी प्रश्न के
Read Moreविकास तभी सार्थक है, जब उसकी कीमत किसी की पहचान, आजीविका और अस्तित्व न बने। आज भारत इसी प्रश्न के
Read Moreहर बदलाव नई चीज़ों से नहीं, नई सोच से जन्म लेता है। भारत में यूज्ड इलेक्ट्रिक वाहनों का तेज़ी से
Read Moreजब किसी शहर से बच्चों की खिलखिलाहट गुम होने लगे, समझ लेना चाहिए कि वहां विकास ने दिशा खो दी
Read Moreप्रकृति जब रौद्र रूप धारण करती है, तब मनुष्य की सारी शक्ति क्षणभर में प्रभावहीन हो जाती है। मानसून इसका
Read Moreकूटनीति की असली ताकत हाथ मिलाने, औपचारिक स्वागत या साझा तस्वीरों में नहीं, बल्कि उस विश्वास में दिखाई देती है,
Read Moreभारतीय सभ्यता सदियों तक ऋतुओं पर उतना ही भरोसा करती रही, जितना सूर्योदय पर। खेती, नदियाँ, पर्व-त्योहार और जीवन मौसम
Read Moreइतिहास गवाह है कि किसी राष्ट्र की दिशा केवल युद्धक्षेत्रों से नहीं, बल्कि नीतिगत निर्णयों से भी तय होती है।
Read Moreजब किसी शहर की चमक झुग्गियों के अँधेरे को ढकने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि विकास की तस्वीर अभी
Read Moreभारतीय शहर आज विकास की सबसे बड़ी विडंबना का प्रतीक बन चुके हैं। वर्ष का एक हिस्सा पानी की एक-एक
Read Moreभारतीय राजनीति की सबसे ऊंची कुर्सियों के लिए अब केवल जनादेश पर्याप्त नहीं रहेगा, बल्कि कानून की कसौटी पर खरा
Read More