इंसाफ तीन साल में? या फिर सिर्फ एक और वादा
न्याय की धीमी रफ्तार लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है। जब इंसाफ की प्रतीक्षा में पीढ़ियाँ गुजर जाएँ, तो अधिकार
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Read Moreनागोया में भारतीय बेटियों ने स्वर्णिम सफलताओं से ऐसा इतिहास रचा, जिसकी गूंज पदकों की खनक से कहीं आगे तक
Read Moreविकास का उद्देश्य आर्थिक आँकड़े चमकाना है या नागरिकों का जीवन सँवारना? जब गाँव का किसान फसल के लिए पानी
Read Moreलोकतंत्र की असली ताकत वोट में नहीं, उस भरोसे में है जो वोट के बाद बचा रहता है। नागरिक को
Read Moreकभी अफवाह पैदल चलती थी, इसलिए उसे फैलने में वक्त लगता था। अब उसके पास एआई का इंजन है—वह उड़ती
Read Moreकागज कंप्यूटर में पहुंच गया, व्यवस्था वहीं की वहीं है। जिस देश में सरकार मोबाइल पर सेवाएं देने का दावा
Read Moreमध्यप्रदेश की ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ का तीसरे दिन ही ऐसा इम्तिहान हुआ कि नाम ‘सुगम’ और नतीजा ‘गम’ बन
Read Moreकिसान की पहचान अगर जमीन के कागज से होती है, तो खेत में पसीना बहाने वाली महिला कौन है? यही
Read Moreबाढ़ आती है तो सिर्फ घर नहीं, पूरी जिंदगी बह जाती है। सूखा पड़ता है तो खेतों के साथ उम्मीदें
Read Moreमांग किसी की हो, कीमत अक्सर किसी और को चुकानी पड़ती है। बैंक कर्मचारियों की मांग हो तो बैंक बंद,
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