Author: प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

सामाजिक

मैं अब नहीं लड़ता… क्योंकि मैंने खुद को खोकर जीतना छोड़ दिया है

जब जीवन बहुत कुछ सिखा देता है, तब इंसान हर आवाज़ का जवाब देना और हर लड़ाई लड़ना छोड़ देता

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सामाजिक

मैम, मुझे आपके बाल बहुत पसंद हैं.. और सब कुछ बदल गया

कुछ फैसले दिमाग में नहीं, मनुष्यता की भीगी तहों में जन्म लेते हैं। वे तर्क से नहीं, अनदेखे दर्द की

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राजनीति

अरुण यादव की सादगी में छिपी है मध्य प्रदेश कांग्रेस की नई सुबह

राजनीतिक विरासत उपाधियों या पारिवारिक पहचान से नहीं, जनविश्वास, वैचारिक दृढ़ता और जनसंघर्ष से निर्मित होती है। कुछ व्यक्तित्व इतिहास

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राजनीति

एक कैंटीन से उठा सवाल: व्यवस्था का सच आखिर कहाँ है?

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना गलती होना नहीं, बल्कि उसे उपलब्धि के प्रमाणपत्र से ढक देना है। जब सच कागजी

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राजनीति

सुविधाएँ बढ़ीं, बजट बढ़ा, फिर भी व्यवस्था वहीं क्यों?

शिकायतों की सूची लंबी है—अस्पताल में दवा नहीं, स्कूल में शिक्षक नहीं, सड़क पर रोशनी नहीं, कार्यालय में कर्मचारी नहीं।

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सामाजिक

आस्था की भव्यता अब प्रकृति को बोझ बनाती जा रही है

उत्सव कभी केवल मनुष्य के आयोजन नहीं थे; वे प्रकृति के साथ हमारी मौन आत्मीयता के प्रतीक थे। हमारी सांस्कृतिक

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राजनीति

2047 तक भारत अमीर बनेगा या सिर्फ अमीरों का भारत?

2047 में जब भारत अपनी आज़ादी का शताब्दी वर्ष मनाएगा, तब दुनिया केवल हमारी अर्थव्यवस्था का आकार नहीं, बल्कि यह

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धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

स्तूप ने साबित कर दिया : असली शक्ति शस्त्रों में नहीं, संस्कृति में है

इतिहास की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि वह अतीत में दर्ज है, बल्कि यह कि वह हर युग में

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पर्यावरण

जल संरक्षण अब सिर्फ परियोजना नहीं, राष्ट्रीय संस्कार बनना चाहिए

भारत का जल संकट नदियों में घटते प्रवाह से अधिक, हमारी नीतियों में घटती दूरदृष्टि का संकट है। विडंबना यह

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राजनीति

तिरस्कार से तख्त तक: ‘कीड़ों’ ने सत्ता नहीं, सोच को चुनौती दी

हर युग अपने प्रतीक स्वयं गढ़ता है। कभी कोई शब्द अपमान का पर्याय होता है और कभी वही शब्द परिवर्तन

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