ग़ज़ल
नज़र से नज़र की जो ‘मुलाक़ात’ हो गई,
खामोश थी वो बस एक ही बात हो गई।
चाय की ‘महक’ में घुल-सा गया इकरार,
लब कुछ न बोले, मगर शुरुआत हो गई।
जाने उसकी हँसी में जैसे कोई राग छुपा,
दिल की धड़कनों में नई ‘सौगात’ हो गई।
आँखों ने ही पूछ लीं हर अनकही कहानी,
बिना ‘अल्फ़ाज़’ के ही सारी बात हो गई।
वो सामने बैठा था, वक्त यूं ठहर सा गया,
लम्हों की यह मुलाक़ात, जज़्बात हो गई।
कहना तो बहुत था, मगर हम कह न सके,
वो चुप्पी ही जैसे दिल की ज़ुबान हो गई।
ये इश्क़ भी बड़ा अजीब है ‘संजय’, देखो,
एक नज़र में ही पूरी ये कायनात हो गई।
— संजय एम तराणेकर
