कहानी – इंसानियत
गांव के बाहरी छोर पर बने उस पुराने घर में कभी बहुत रौनक हुआ करती थी। घर के आंगन में
Read Moreगांव के बाहरी छोर पर बने उस पुराने घर में कभी बहुत रौनक हुआ करती थी। घर के आंगन में
Read Moreबुज़ुर्ग असलम साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी का एक-एक तिनका जोड़कर अपने इकलौते बेटे, फ़रहान, को इस क़ाबिल बनाया था
Read Moreशहर की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, ऊंची इमारतें और मसनूई रोशनियां कभी कभार इंसान को अंदर से बिल्कुल ख़ाली कर देती
Read Moreउस बड़े से पुश्तैनी ज़मीन की में अगर किसी का पसीना और त्याग छुपा था, तो वह सिर्फ़ बड़ा भाई
Read Moreपहाड़ों की ओट से जब सूरज की पहली किरन निकलती, तो वादी-ए-चिनार सुर्ख़ सुनहरी रोशनी में नहा जाती। इसी वादी
Read Moreस्टेशन उस शाम असामान्य रूप से भरा हुआ था। बरसात अभी-अभी थमी थी और प्लेटफ़ॉर्म की भीगी ज़मीन पर भागते
Read Moreवह चौबीस साल की उम्र का अलबेलापन था, जब जिंदगी सिर्फ स्कूल के ब्लैक बोर्ड, चाक की धूल और चंद
Read Moreशाम के साए ज़रा गहरे हो चुके थे। रेलवे स्टेशन के मुसाफ़िरख़ाने में बत्तियों की मद्धम रोशनी फैली हुई थी।
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