स्वयंसिद्धा
आज सुलेखा के पांव जमीं पर नहीं पड रहे थे। पाँखों में हौसले का बल भर ऊँची उड़ान भरने में
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Read Moreसत्या बहू भाग भाग कर सारी तैयारी कर रही थी। तभी किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ रखा –
Read Moreवादी-ए-कश्मीर की वह शाम अपनी पूरी रानाइयों के साथ ढल रही थी। पहाड़ों की ऊँची चोटियों पर जमी बर्फ़, डूबते
Read Moreवक़ार अहमद की ज़िंदगी अब एक ठहरी हुई झील की तरह थी। एक छोटा सा शहर, चंद वफ़ादार दोस्त और
Read Moreअलमारी के सबसे पिछले हिस्से में, कपड़ों की तहों के नीचे दबे वो चंद नोट महज़ कागज़ के टुकड़े नहीं
Read Moreप्रीत एक सीधी सादी यूपी की रहने वाली लड़की थी। बात उन दिनों की है जब प्रयागराज इलाहाबाद हुआ करता
Read Moreरात के दस बजे थे। एक आलीशान रेस्टोरेंट में डोसा खाने का आर्डर दिया। जब साथ होती थी दिव्या। एक
Read Moreबचपन से ही आर्थिक धूप- छांव में पली नमिता । रोजमर्रा की जरूरते तो जरूर पूरा हो जाता लेकिन कभी
Read Moreविकास ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन उसे सब कुछ छोड़कर भागना पड़ेगा। दुबई की चमचमाती इमारतों के
Read Moreबरसों बीत गए थे, यादों की धूल ने उन रास्तों को धुंधला कर दिया था जिन पर हम कभी साथ
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