बुढ़ापे की लाचारी और कमज़ोर होते जिस्म ने उनकी हिम्मत को और तोड़ दिया था।
शाम का वक्त था। बाहर हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी और लिविंग रूम में दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक
Read Moreशाम का वक्त था। बाहर हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी और लिविंग रूम में दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक
Read More(“औलाद दरख़्त की तरह होती है… माँ-बाप उसे अपने खून-ए-जिगर से सींचते हैं, उसे जवान करते हैं, उस पर फ़ूल
Read Moreमहानगर के उस सबसे व्यस्त चौराहे पर, जहाँ ज़िंदगी रोबोटिक रफ़्तार से दौड़ती है, लाल बत्ती की हर एक चीख़
Read Moreबी.एड. कॉलेज की वह विशाल इमारत, हरे-भरे मैदान और कैंपस का वह पुराना पीपल का पेड़… जहाँ ज़िंदगी अपनी पूरी
Read Moreकमरे की दीवार पर टंगी दो तस्वीरें,एक माँ की और दूसरी अब्बा की। जिन पर धूल जम चुकी थी, मगर
Read Moreशाम का धुंधलका था, शहर के किसी मसरूफ़ तरीन चौराहे पर ट्रैफ़िक का शोर और हुजूम अपनी इंतहा पर था।
Read Moreइलाका पहाड़ी था,कोहरे और धुंध की चादर ओढ़े ऊँचे-ऊँचे पाकीज़ा दरख़्त, आसमान से बातें करती चोटियाँ, और घुमावदार रास्तों पर
Read Moreजून की तपती दोपहर हो या जुलाई की उमस भरी शाम, सुनील का पूरा दिन सीढ़ी पर ही बीतता था।
Read More‘‘मुझे तो वह सब याद भी नहीं था, पर प्रदीप ने कहा तब मुझे सब याद आ गया। मैं तो
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