रेलवे स्टेशन
भीषण गर्मी की वह दोपहर थी। अपने शहर के छोटे-से रेलवे स्टेशन तक पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगने लगा था, जैसे सूरज
Read Moreभीषण गर्मी की वह दोपहर थी। अपने शहर के छोटे-से रेलवे स्टेशन तक पहुँचते-पहुँचते ऐसा लगने लगा था, जैसे सूरज
Read Moreगाड़ी के रुकते ही धुएँ का एक भारी गुबार खिड़की के टूटे हुए शीशे से अंदर दाखिल हुआ। बस के
Read Moreशादी के सात दिन बीत चुके थे, लेकिन घर के आँगन में अभी भी हल्दी और गेंदे के फूलों की
Read Moreतलाश का आगाज़ एक छोटा सा लड़का था—आरव। उसकी आँखों में दुनिया को देखने की एक अजीब सी बेताबी थी।
Read Moreरात भर आसमान चीखते- चीखते सो चुका था। धरती पर फैले रूधिर रक्त ने उसका रंग बदल दिया था। सूरज
Read Moreट्रेन के डिब्बे में लोगों की चहल-पहल थी, पटरियों पर लोहे के टकराने की गड़गड़ाहट और बाहर गुज़रते हुए मंज़र…
Read Moreआप उन लोगों के बारे में क्या सोचते हैं, जो किसी भी स्थिति में सच को सच कहते हैं और
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