कहानी

रिटायरमेंट

आज पूरे ऑफिस में अजीब-सी हलचल थी। किसी की मेज पर मिठाई के डिब्बे थे, तो किसी के हाथ में फूलों की माला। हँसी-मज़ाक, चाय और तालियों के बीच एक चेहरा था — शांत, विनम्र और हल्की-सी नमी से भरा हुआ। आज राम प्रसाद वर्मा जी रिटायर हो रहे थे। बत्तीस साल पहले जब उन्होंने इस ऑफिस में कदम रखा था, तब वह एक मामूली हेल्पर थे। धीरे-धीरे मेहनत, ईमानदारी और चुपचाप काम करते-करते वह डिस्पैच क्लर्क बन गए थे। उनके पास न बड़े सपने थे, न कोई शिकायत — बस परिवार को संभालने की जिम्मेदारी थी। उनके परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे थे — बड़ा बेटा रवि, जो आज बेंगलुरु में नौकरी करता था… और छोटा बेटा बिमल, जो दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रहा था। लेकिन यह सब यूँ ही नहीं हुआ था।
उन्हें अचानक वह दिन याद आ गया जब रवि की स्कूल फीस भरने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उस दिन वर्मा जी देर रात तक ऑफिस में ओवरटाइम करते रहे थे। घर आए तो पत्नी ने पूछा था — “इतनी देर क्यों हो गई?”
वर्मा जी ने थके हुए स्वर में कहा था — “कल रवि की फीस भरनी है… इसलिए।”
एक और याद आँखों के सामने तैर गई — सर्दियों की ठंडी सुबह… छोटा बेटा बिमल बुखार में भी स्कूल जाने की जिद कर रहा था। वर्मा जी ने उसे कंधे पर बैठाया और आधा किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल छोड़ने गए थे, क्योंकि उस दिन जेब में रिक्शे के पैसे भी नहीं थे। और फिर वह दिन… जब दोनों बेटों की पढ़ाई के लिए उन्होंने पत्नी के दो पुराने गहने बेच दिए थे।
पत्नी ने सिर्फ इतना कहा था — “बच्चे पढ़ जाएँ, बस वही सबसे बड़ा गहना है।”
वर्मा जी अक्सर कहा करते थे — “मेरी असली जमा पूंजी मेरे बच्चे हैं।”
शर्मा जी ने माला पहनाते हुए कहा — “वर्मा जी, आपने कभी किसी से ऊँची आवाज़ में बात तक नहीं की। ऐसे लोग अब मिलते कहाँ हैं?” सब हँस पड़े।
वर्मा जी ने मुस्कुराकर कहा — “अब तो बस बच्चों के साथ रहना है। पोते-पोती को स्कूल छोड़ूँगा… और अपनी बीवी को भी थोड़ा आराम कराऊँगा।”
तालियाँ गूँज उठीं। लेकिन उन तालियों के बीच एक सच भी छिपा था — आज के बाद यह कुर्सी उनकी नहीं रहेगी।
घर लौटते समय उनके हाथ उपहारों से भरे थे… और दिल उम्मीदों से। दरवाज़ा खुलते ही पत्नी ने पूछा — “कैसी रही विदाई?”
वर्मा जी ने धीमे से कहा — “बहुत अच्छी… सब कह रहे थे, अब आराम करना।”
पत्नी हँस पड़ी — “तो अब हम भी बच्चों के पास चलेंगे न? रवि के पास पहले चलेंगे या बिमल के पास?”
वर्मा जी मुस्कुराए — “पहले बड़े के पास… वह हमेशा कहता था ‘पापा, बस आप रिटायर हो जाओ, फिर आप मेरे पास ही रहोगे।’ ”
पूरा हफ्ता दोनों पति-पत्नी इसी सपने में जीते रहे। लेकिन एक हफ्ता बीत गया… फिर दूसरा भी… न बड़े बेटे का फोन आया, न छोटे का।
आख़िर एक दिन वर्मा जी ने खुद ही फोन लगाया। “हेलो रवि बेटा, कैसे हो?”
“ठीक हूँ पापा… आप बताइए।”
कुछ पल की चुप्पी के बाद वर्मा जी बोले — “अब मैं रिटायर हो गया हूँ… सोच रहा था कुछ दिन तुम्हारे पास आ जाऊँ।”
फोन के उस पार सन्नाटा छा गया। फिर एक ठंडी-सी आवाज़ आई — “पापा… यहाँ फ्लैट बहुत छोटा है। जगह नहीं है। और दिल्ली में भी बिमल का वही हाल है। आप वहीं रहिए… हम पैसे भेज दिया करेंगे।”
वर्मा जी के होंठ काँपने लगे। “मतलब… मेरे लिए कहीं जगह नहीं है बेटा?”
उधर से सिर्फ इतना जवाब आया — “अभी तो नहीं पापा… बाद में देखते हैं।”

फोन कट गया। कमरे में अजीब-सा सन्नाटा फैल गया। पत्नी ने घबराकर पूछा — “क्या हुआ?”
वर्मा जी ने बस इतना कहा — “जिनके लिए सब कुछ किया… उनके पास हमारे लिए जगह नहीं है…”
उस रात वर्मा जी बहुत देर तक जागते रहे। छत को देखते-देखते उनकी आँखों के सामने एक-एक करके वही पुराने दिन आते रहे — रवि की फीस… बिमल का बुखार… पत्नी के गहने… और उनकी अपनी अधूरी जरूरतें। अगली सुबह वह बिना कुछ बताए घर से निकल गए। जब वह अपनी ही कम्पनी के गेट पर पहुँचे, तो वहाँ मजदूरों की भर्ती की लाइन लगी हुई थी। वर्मा जी भी चुपचाप उसी लाइन में खड़े हो गए।
सुपरवाइजर ने उन्हें देखा तो चौंक पड़ा — “अरे वर्मा जी! आप? आप तो दस दिन पहले ही रिटायर हुए थे!”
वर्मा जी मुस्कुराए… लेकिन उस मुस्कान में बहुत थकान थी।
धीरे से बोले — “साहब… उम्र रिटायर हो जाती है, लेकिन भूख और जरूरतें कभी रिटायर नहीं होतीं…”
लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी… और वर्मा जी फिर से उसी जिंदगी की शुरुआत करने जा रहे थे…

— प्रज्ञा पांडेय मनु

*प्रज्ञा पाण्डेय 'मनु'

वापी़, गुजरात