कविता

कलम न उठाने के कारण

तुम्हारे सहे हुए उत्पीड़न का दर्द,
जो तुमने कभी नहीं लिखा,
उसकी सज़ा तुम्हारी औलादें
क्यों और कब तक भुगतें?

काश! तुमने उसे शब्दों में ढाला होता,
दुनिया को उसका चेहरा दिखाया होता,
तो शायद अत्याचारी सबक ले चुके होते,
फिर बहती गंगा में हाथ न धोते।

या तुम्हारी पीड़ा पढ़कर
कोई अपना हाथ इतना मजबूत कर चुका होता,
कि किसी की हिम्मत न पड़ती
वही अत्याचार दोहराने की,
जिन्हें न संविधान का भय है,
न परवाह जमाने की।

हाँ, यह भी संभव था कि
तुम्हारे ही रक्त के लोग
बदले की राह पर निकल पड़ते,
पर तुमने संतोष कर लिया
उन्हीं के दिए हुए नामों के आगे
गिड़गिड़ाती प्रार्थनाओं से।

यह कैसी नज़ीर गढ़ रहे हो
इतने विशाल समाज के सामने,
कि लोग डर-डरकर जीते रहें,
कायर बनकर सब सहते रहें,
और पुरखों की तरह
अपना दुःख भीतर ही भीतर ढोते रहें।

जबकि इस देश का कानून
अन्याय के विरुद्ध डटकर खड़े होने की
पूर्ण इजाज़त देता है,
और आत्मरक्षा का अधिकार भी।

मुझे इतना लिखना पड़ा
सिर्फ तुम्हारे कलम न उठाने के कारण,
क्योंकि हर समस्या का
होता है एक उचित निवारण,
और हर अन्याय का
है इतिहास में दर्ज होना जरूरी।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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