दोनों साथ चल रहे थे
वह सुनहरी दोपहर थी जब दफ़्तर में दाख़िल हुआ और काग़ज़ पर नज़र डाली, तो पलट कर देखा कि सामने एक नई दुनिया थी। म्युनिसिपल हाई स्कूल का वह पुराना कमरा, और खिड़की से आते हुए अमरूद के पत्तों की सरसराहट सुनाई दे रही थी।
ज़हैब और आलया की कहानी वहीं से शुरू हुई। उनकी पहली मुलाक़ात कुछ इस तरह हुई कि लाइब्रेरी की ऊँची अलमारी से किताबें निकालते वक़्त आलया के हाथ से एक किताब गिर गई ,दीवान-ए-ग़ालिब। ज़हैब ने फ़ौरन झुक कर वह किताब उठाई और आहिस्ता से कहा,
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले…”
आलया ने अपनी निगाहें उठाईं, होंठों पर एक हल्की सी मुस्कराहट आई और बोली, “और कितने ही अरमान ऐसे थे जो इस किताब के पन्नों में दफ़्न हो गए।”
वे छोटी-छोटी बातें, टिफ़िन शेयर करने के बहाने, और स्कूल के कॉरिडोर में उर्दू के शब्दों पर बहस करना ,यही उनका पहला इश्क़ था। वे एक-दूसरे को ख़त लिखा करते थे, जिनके शब्द आम नहीं होते थे बल्कि अकबर इलाहाबादी और मोमिन के अशआर से सजे होते थे।
वक़्त गुज़रा, स्कूल की दीवारें पीछे छूट गईं और दोनों शहर के मशहूर गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज में आ गए। अब माहौल बदल चुका था। कॉलेज की लाल ईंटों वाली इमारत, बड़े-बड़े पेड़ और कैंटीन की चाय पर होने वाली शेर-ओ-शायरी की महफ़िलें अब उनकी दास्तान का केंद्र बन चुकी थीं।
कॉलेज के दिनों में इश्क़ ने एक नया रूप धारण कर लिया। अब मुलाक़ातें सिर्फ़ चुपचाप इशारों में नहीं, बल्कि कॉलेज के मुशायरों और बज़्म-ए-अदब में होने लगीं। ज़हैब अब कॉलेज का एक बेहतरीन शायर बन चुका था और आलया उसकी हर ग़ज़ल की पहली नाक़िद और सबसे बड़ी तारीफ़ करने वाली थी।
एक शाम, कॉलेज के लॉन में जब ठंडी हवा चल रही थी और सूरज ढल रहा था, ज़हैब ने आलया की तरफ़ देखा और अपने दिल की बात कह दी,
“तुम्हें मालूम है आलया, इस कॉलेज के ये रास्ते, ये किताबें और ये शामें… सब सिर्फ़ इसलिए हसीन हैं क्योंकि इनमें तुम्हारा अक्स शामिल है।”
आलया ने अपना दुपट्टा ठीक करते हुए नज़रें झुका लीं और धीरे से कहा,
“ज़हैब, हमारी मोहब्बत किसी पुराने उर्दू उपन्यास की तरह है… जिसमें जल्दबाज़ी नहीं है, बस एक गहराई है जो वक़्त के साथ और ज़्यादा बढ़ रही है।”
कॉलेज के आख़िरी साल तक उनका इश्क़ दिलों की गहराइयों में उतर चुका था। उनकी यह मोहब्बत की कहानी कोई आम कहानी नहीं थी, यह दो रूहों का ऐसा मिलन था जो उर्दू ज़बान की खुशबू, तहज़ीब और धीमी फ़िज़ा में परवान चढ़ी थी, जहाँ शब्द कम और जज़्बात ज़्यादा बोलते थे।
अब दोनों की डिग्री मुकम्मल हो चुकी थी, और कॉलेज की दहलीज़ पीछे छूटने के बाद उनकी निगाहें भविष्य पर थीं। ज़हैब के हाथ में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री थी और दिल में अदब की शमा जलाने का संकल्प,तो दूसरी तरफ़ आलया ने भी अपने ख़्वाबों को हक़ीक़त का रूप देने की तैयारी कर ली थी।
लेकिन डिग्रियों की तकमील (समाप्ति) और भविष्य के हसीन ख़्वाबों के बीच, हक़ीक़त का एक सख़्त और सर्द सूरज उदय हो चुका था। अब वे सिर्फ़ ज़हैब और आलया नहीं रहे थे, बल्कि उनके नामों के साथ उनके ख़ानदान, समाज और रिवायतों (परंपराओं) की वे ज़ंजीरें भी जुड़ी थीं जिन्हें तोड़ना इतना आसान नहीं था। घरों में अब उनकी शादी के चर्चे और दूसरे ख़ानदानों से रिश्ते तलाश करने की बातें होने लगीं थीं। समाज के पुराने ज़ाब्ते (नियम) और पारिवारिक प्रतिष्ठा की दीवारें दोनों की मोहब्बत के बीच हाइल (रुकावट) होने लगी थीं।
एक शाम, उसी पुराने पार्क के कोने में, जहाँ अब ख़िज़ाँ के ज़र्द (पीले) पत्ते बिखरे हुए थे, दोनों ख़ामोश बैठे थे। आलया की पलकें भीगी हुई थीं,
“ज़हैब… घरवाले अब ख़ामोश नहीं बैठने वाले। हवेलियाँ और ख़ानदान के पुराने दस्तूर अपने फ़ैसले सुनाने लगे हैं। मेरे घर में भी अब दूसरे रिश्तों की आहट सुनाई देने लगी है। क्या हमारा यह इश्क़ महज़ किताबों के पन्नों तक ही महदूद (सीमित) रह जाएगा?”
ज़हैब ने एक गहरा साँस लिया और कहा,
“आलया, मीर तकी मीर ने यूँ ही तो नहीं कहा था , मोहब्बत का यह रिश्ता है, बड़ा नाज़ुक बड़ा कच्चा, ज़माने की निगाहों से बचा कर इसको रखना है! मैं मानता हूँ कि समाज के दस्तूर और ख़ानदानी रिश्ते बहुत मज़बूत हैं, मगर मेरा यक़ीन कहता है कि इख़्लास (ईमानदारी) से माँगी गई दुआ और सच्चे दिल की मोहब्बत को कोई भी दीवार ज़्यादा देर तक रोक नहीं सकती।”
वक़्त के ये थपेड़े और रिश्तों के ये दबाव भी उनके इख़्लास को कम न कर सके। लेकिन अब उनके मिलने का अंदाज़ बदल चुका था। शोर-शराबे के बजाय उनकी मुलाक़ातों में एक गहरी शालीनता और ठहराव आ गया था। जिस तरह मुश्क़ की ख़ुशबू छुपाए नहीं छुपती और हवा के दोश पर चारों तरफ़ फैल जाती है, बिल्कुल उसी तरह उनकी यह मोहब्बत भी शहर की फ़िज़ा में महकने लगी थी।
लेकिन इस महकते एहसास के साथ ही एक और तल्ख़ (कड़वी) हक़ीक़त भी सर उठा रही थी,वह थी अहंकार और ख़ानदानी वक़ार (प्रतिष्ठा) की ऊँची दीवारें। आलिया के घरवाले अपनी रिवायतों और सामाजिक बरतरी (श्रेष्ठता) के खोल में बंद थे, तो दूसरी तरफ़ ज़हैब का ख़ानदान भी अपनी आत्मसम्मान की ज़िद पर अड़ा हुआ था।
फ़िर वह दिन आ ही गया जब एक प्रतिष्ठित घरवाले, जिनसे आलया का रिश्ता तय करने की बात चल रही थी आलया के घर आए और सख़्त, बेरहम और सर्द लहजे में बोले, “हमें मालूम हो चुका है कि यहाँ क्या कुछ पक रहा है और किस नामनिहाद (तथाकथित) मोहब्बत की खुशबू फ़िज़ा में फ़ैल रही है। ऐसी आज़ाद ख़्याल फ़िज़ा हमारे ख़ानदानी वक़ार के ख़िलाफ़ है। हमें अब यह रिश्ता हरगिज़ मंज़ूर नहीं!”
इतना कहकर उन्होंने अपना दामन छुड़ाया और उठकर चले गए। इसके बाद घर में एक क़यामत बरपा हो गई। आलया पर क़ैद और पहरे सख़्त कर दिए गए। जब यह ख़बर ज़हैब तक पहुँची तो उसने अकेले में आसमान की तरफ़ देखा और दिल ही दिल में कहा,
“दामन तो उन्होंने खींच लिया, और रिश्ता भी तोड़ दिया… मगर वे यह नहीं जानते कि हवाओं में रची हुई इस खुशबू को कोई कैसे क़ैद कर सकता है?”
कुछ दिन और रातें मुसलसल बेचैनी में गुज़रे। फ़िर अचानक, शहर के उसी पुराने कॉलेज से एक इश्तिहार निकला , जूनियर लेक्चरर के पद के लिए। ज़हैब और आलया दोनों ने अपनी क़ाबलियत (योग्यता) के बल पर इसके लिए आवेदन किया था।
इंटरव्यू हॉल के बाहर उम्मीदवारों का हुजूम था। जब आलया हॉल के अंदर दाख़िल होने के लिए आगे बढ़ी, तो अचानक कॉरिडोर के मोड़ पर ज़हैब से उसका आमना-सामना हो गया। वक़्त जैसे वहीं थम गया। दोनों की सिर्फ़ निगाहें मिलीं , बिना किसी शब्द के, मगर उन निगाहों ने वह सब कुछ कह दिया जो महीनों की ख़ामोशी में न कहा जा सका था। वह पल सिर्फ़ एक सेकंड का था, लेकिन उसने दोनों के दिलों में एक नया हौसला भर दिया।
कुछ ही दिनों बाद नोटिस बोर्ड पर नतीजा आ गया , ज़हैब और आलया दोनों का बतौर जूनियर लेक्चरर चयन हो चुका था! कॉलेज के कॉरिडोर में उन्हें मुबारकबाद (बधाई) देने वालों का ताँता बँध गया था। ज़ाहिरी (प्रत्यक्ष) तौर पर यह उनकी पेशेवर ज़िंदगी की कामयाबी थी, मगर दिल की गहराइयों में यह उस सब्र और अज़़्म (संकल्प) की जीत थी जिसे उन्होंने इन मुश्किल हालात में ज़िंदा रखा था।
कॉलेज में जॉइनिंग लेने के बाद, अब वह दिन भी आ पहुँचा जिसका दोनों को शिद्दत से इंतज़ार था। तमाम रुकावटों, तूफ़ानों और आज़माइशों को पार करते हुए, दोनों ने अपने बुजुर्गों की रज़ामंदी और एक बावक़ार (प्रतिष्ठित) महफ़िल में निकाह के पवित्र रिश्ते से अपनी मोहब्बत पर हमेशा के लिए मुहर लगा दी। अब किसी के पास कुछ भी कहने की गुंजाइश नहीं बची थी। ज़माने के वे तमाम अनायें (अहंकार) जिनके बड़े-बड़े मीनार खड़े किए गए थे, उस वक्त सिर झुकाए खड़े थे जब ज़हैब और आलया ने अपने मक़ाम से साबित कर दिया कि इख़्लास कभी हारता नहीं।
शाम का वक़्त था, और पुराने कॉलेज के परिसर में लगे गुलाब के पौधों पर हल्की-हल्की धूप बिखरी हुई थी। ज़हैब और आलया अपने लेक्चरर के कोट पहने, हाथ में किताबें थामे, उसी बरामदे से गुज़र रहे थे जहाँ उन्होंने एक दूसरे को कई बार देखा था।
वे दोनों चलते-चलते उसी पुराने पेड़ की छाया में रुके जहाँ बरसों पहले उन्होंने अपने ख़्वाब बुने थे। ज़हैब ने मुस्कुरा कर आलया की तरफ़ देखा और धीमे लहजे में कहा,
“आलिया , तुम्हें याद है जब हमने स्कूल की दहलीज़ पर पहला क़दम रखा था? ऐसा लगता है कल ही की बात है जब मीर और इक़बाल के अशआर हमारी ज़बान पर हुआ करते थे।”
आलिया ने अपनी पलकें उठाईं, चेहरे पर वही पुरानी मुस्कराहट थी, उसने फ़िज़ा में साँस ली जहाँ अब भी मुश्क की सी हल्की खुशबू बसी हुई थी, और बोली,
“हाँ ज़हैब! लोग कहते हैं वक़्त बदल जाता है, रिश्ते बदल जाते हैं, मगर हमारी मोहब्बत किसी पुराने उर्दू शेर की तरह है, जितना पढ़ो, उसका अर्थ उतना ही निख़रता चला जाता है। ज़माने ने दीवारें खड़ी करने की पूरी कोशिश की, मगर हमारे इख़्लास ने उन तमाम दीवारों को मिटा दिया।”
शाम का सूरज आहिस्ता-आहिस्ता क्षितिज में डूब रहा था, और उनके क़दम आने वाले कल की तरफ़ एक साथ, खुशनुमा अंदाज़ में बढ़ रहे थे। उनकी यह कहानी सिर्फ़ दो लोगों के मिलने की कहानी नहीं थी, यह उस तहज़ीब, सब्र और सच्चे इश्क़ की दास्तान थी जो हमेशा फ़िज़ा में महकती रहेगी।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
