गीत
महाशृंगार छंद की 16-16 मात्रा, 16 पर यति और गुरु-लघु चरणांत की लय को ध्यान में रखकर प्रातःकाल की प्राकृतिक छटा पर गीत प्रस्तुत है। महाशृंगार में सामान्यतः चार चरणों में 16-16 मात्रा और दो-दो चरणों की तुकांत योजना रखी जाती है।
उषा बेला का चित्र (प्राची का अरुणिम भाल)
(महाशृंगार छंदाधारित गीत)
मुखड़ा
सूर्य की प्रथम रश्मि के साथ,
सजा प्राची का अरुणिम भाल।
नाचती हैं किरणें अव्याज,
विहंगम रव का पाकर ताल।।
खिले हैं कमल सरोवर कूल,
बही मधुरिम है मलय बयार।
महक उठते वन-पथ औ’ वाट,
बिखरने लगा सुवास अपार।।
गगन में उषा सजा श्रृंगार,
लजीली धरती हुई निहाल।
पखेरू गाने लगे प्रभात,
हुआ उपवन गुंजित तत्काल।।
ओस-मुक्ता दूर्वा पर आज,
लुटाती है अपना उजियार।
हँसे पल्लव-प्रसून मकरंद ,
मधुर भौंरों की है झंकार।।
जगा जीवन का नव उल्लास,
मिटा तम का सारा जंजाल।
प्रकृति ने बाँटी नव मुस्कान,
हुआ मन-मंदिर फिर खुशहाल।।
उगे रवि लेकर स्वर्णिम हास,
दिशाएँ करतीं उसका मान।
जगे मानव शुभ कर्म-स्वभाव,
बने जीवन फिर साधन-स्थान।।
कहो हे मानव! जागो आज,
समय देता नव कर्म पुकार।
सृजन की साधो पावन राह,
करो जग का जीवन सुखसार।।
टेक
सूर्य की प्रथम रश्मि के साथ,
सजा प्राची का अरुणिम भाल।
नाचती हैं किरणें अव्याज,
विहंगम रव का पाकर ताल।।
यह गीत प्रकृति-सौंदर्य से आरंभ होकर ‘सृजन से लोकमंगल’ की साधनावादी जीवन-दृष्टि तक पहुँचता है।
— आचार्य डॉ. ओम प्रकाश मिश्र मधुब्रत

छंदबद्ध रचना में प्रकृति की छटा का मनोरम चित्रण है। डा ओमप्रकाश मिश्र मधुव्रत जी को हार्दिक बधाई व अभिनंदन।