श्राद्ध नहीं बस अन्न है
जीते जी जिनको दिया, तानों का उपहार।
मरने पर तस्वीर को, चढ़ते फूल हजार।।
बाप पसीना बेचकर, करता घर आबाद।
आज बुढ़ापे में उसे, बेटे करें न याद।।
जीवन भर जो पालते, रखकर अपनी भूख।
उनके हिस्से छोड़ दी, वृद्धाश्रम की रूख।।
जीते जी दो रोटियाँ, दे न सके परिवार।
श्राद्ध दिवस पर भोज का, करते हैं विस्तार।।
सेवा में माँ-बाप की, जितना सच्चा प्यार।
उतना ही पावन बने, पूजा और’ व्यवहार।।
तीर्थ गए संसार में, खोज रहे भगवान।
घर बैठे माँ-बाप में, छूटा सच्चा ज्ञान।।
पिंड चढ़ाकर सोचते, मिल जाएगा मोक्ष।
जीते जी माँ-बाप के, रहते कष्ट परोक्ष ।।
धन-दौलत के मोह में, रिश्ते गए बिसार।
अब बूढ़े माँ-बाप के, सूने पड़ते द्वार।।
श्राद्ध नहीं बस अन्न है, श्राद्ध नहीं बस दान।
सेवा है माँ-बाप की, सच्चा पुण्य महान।।
माँ की ममता भूलकर, दुनिया में क्या जीत।
जिस घर में ये ना हँसे, कैसी सौरभ प्रीत।।
जीवन भर जो बाँटते, सब बच्चों में प्यार।
उन्हें बुढ़ापे में मिले, थोड़ा सा सत्कार।।
कौवे को भोजन दिया, ब्राह्मण को उपहार।
माँ-बापों की भूख पर, क्यों ना आया प्यार।।
कर्मकांड से क्या मिले, यदि मन में हो खोट।
जीते जी सेवा करो, यही धर्म की ओट।।
माँ-बापों के चरण में, सारे तीर्थ निवास।
जीते जी सेवा करो, यह सच्चा विश्वास।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
