तमस (टेम्स), ओ मां !
हम सूर्य की पूजा करते हैं, लेकिन दुनिया में सिर्फ एक ही सूर्य नहीं है. ऐसे लाखों सूर्य हैं और उनके करोड़ों चंद्रमा हैं. नदियों का मामला भी कुछ ऐसा ही है. एक हमारी गंगा नदी है, लेकिन और भी नदियां गंगा हैं. टेम्स नदी के किनारे गंगा आरती पर मचा बवाल असल में अपनी ही जड़ों से कटे हुए लोगों द्वारा अपनी अज्ञानता की आरती उतारने जैसा है. अगर आपको भी टेम्स किनारे गंगा आरती से ऐतराज है, तो आगे पढ़िए. नहीं है तो ज़रूर पढ़िए. सोशल मीडिया पर जिस बात को लेकर हंगामा मचा, वह यह है कि चिन्मय मिशन के 75 साल पूरे होने के मौके पर ‘टोटली टेम्स’ महोत्सव के तहत लंदन में टेम्स नदी के तट पर पहली बार गंगा आरती के लिए हजारों लोग इकट्ठा हुए. नदी में कोई फूल, मूर्ति या पूजा सामग्री नहीं बहाई गई, और दीये भी किनारे पर ही रखे गए थे. इस लिहाज से देखा जाए तो, गंगा की अपनी धरती पर धर्म के नाम पर नदियों के साथ जो कुछ होता आया है, उसकी तुलना में यह बहुत ज्यादा साफ-सुथरा काम था. पूजा-अर्चना का स्वच्छ उदाहरण. लेकिन सोशल मीडिया पर तो जैसे तूफान ही आ गया. उद्योगपति हर्ष गोयनका ने सवाल उठा दिया कि “गंगा के बिना गंगा आरती कैसे हो सकती है?” और लगे हाथ अजीबोगरीब बातें भी जोड़ दीं. तुलनात्मक ढंग से व्यंग्य कसते गोयनका ने पूछा कि अब आगे क्या? सीन नदी पर कुंभ मेला, कोमो झील में शिकारे, हाइड पार्क में ऊंटों का मेला या बकिंघम पैलेस में गणेश विसर्जन. कुछ दूसरे लोगों ने फैसला सुना दिया कि “इसे टेम्स आरती कहा जाना चाहिए”. हालांकि सबसे बढ़िया जवाब ठाणे से आया, जहां एक सज्जन ने ध्यान दिलाया कि उनके शहर में हर साल मसुंदा तालाब नाम की एक छोटी सी झील पर गंगा आरती होती है. ठाणे के श्रीनिवास गडियार बिल्कुल सही कह रहे हैं, और भाषा के जानकार उनसे सहमत होंगे. ‘गंगा’ शब्द ‘गम’ से बना है, जिसका मतलब होता है ‘चलना’ या ‘बहना’. जो बहती है, वही गंगा है. हमारी गंगा मैया का नाम गंगा है पर नाम के पहले काम ही पहचान रहती है. इसीलिए श्रीलंका के लोग हर नदी को ‘गंगा’ ही कहते हैं, चाहे वह महावेली नदी हो या केलानी नदी. नासिक में गोदावरी नदी की तरफ जाने वाले लोग कहते हैं कि वे गंगा नहाने जा रहे हैं, और ब्रह्म पुराण भी गौतमी गंगा की पूरी कहानी बताकर इस बात का समर्थन करता है. गोदावरी का दूसरा नाम है दक्षिणगंगा। नक्शे पर गंगा खोजना शुरू कीजिए और गिनते जाइए: वैनगंगा, पेनगंगा, बानगंगा, रामगंगा, पंचगंगा, दूधगंगा, किशनगंगा. गिनते-गिनते आपकी सांस फूल जाएगी. यहां तक कि हमारे मिल्की-वे को भी आकाश-गंगा ही कहा जाता है. जीवन देने वाली हर नदी को मां गंगा के रूप में ही पूजा जाता है. कंबोडिया की विशाल मेकॉन्ग का अर्थ खमेर भाषा में ‘मां गंगा’ ही है. ‘मे’ मां का खमेर उ्च्चारण है और ‘कॉन्ग’ गंगा का. भाषा के कुछ जानकार इस बात पर बहस कर सकते हैं कि थाई भाषा का ‘खोंग’ शब्द नदी के लिए एक पुराना शब्द है या कुछ और, लेकिन कंबोडिया के लोगों को संस्कृत से शब्द उधार लेने के लिए किसी की इजाजत की जरूरत नहीं है. और आम थाई लोग भी इस बात से सहमत हैं. मुझे पूरा यकीन है कि हर्ष गोयनका ने भी अपनी जिंदगी में कभी न कभी यह मंत्र जरूर दोहराया होगा- “गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥”. नहाते समय बोला जाने वाला यह मंत्र पानी के उस छोटे से बर्तन में ही सातों पवित्र नदियों को आमंत्रण की प्रार्थना है. बनारस के संत रविदास, जो असली गंगा से थोड़ी ही दूरी पर रहते थे, उन्होंने पांच सौ साल पहले ही इस मामले को सुलझा दिया था- “मन चंगा तो कठौती में गंगा”. अगर दिल साफ है, तो जिस कठौती में बच्चा डुबकी लगाता है, उसी में गंगा है. पानी के हर बर्तन में गंगा का वास है. रविदास के पास अपनी कठौती थी, आपके पास गाजियाबाद में पीतल का लोटा है. अगर गंगा वहां आ सकती हैं, तो वे लंदन के ग्रीनविच भी पहुंच सकती हैं. ऋग्वेद का नदीसूक्त अपनी नदियों की सूची की शुरुआत गंगा के नाम से ही करता है, और तब से हमारी परंपराएं उनका दायरा बढ़ाती आ रही हैं. मॉरीशस में एक झील है जिसे ‘गंगा तालाब’ कहा जाता है. एक्स (ट्विटर) पर अमित शांडिल्य ने ध्यान दिलाया कि सूरीनाम के सरनामी हिंदू अटलांटिक महासागर में डुबकी लगाते हैं और उसे ‘गंगा नहाइन’ कहते हैं. हिंदुओं को गंगा का अहसास करने के लिए कभी सिर्फ एक खास नदी की जरूरत नहीं रही. यही तो गंगा की असली खासियत है. कोई भी सभ्यता एक पेड़ की तरह होती है जिसे ऊपर उठना होता है, अपनी शाखाएं फैलानी होती हैं, और हवा चले तो बीज दूर ताक जाते हैं, तो फिर ग्रीनविच क्यों नहीं. ज्ञान सूरज की किरणों की तरह पत्तों को भोजन देती है. लेकिन असली जीवन-रस अंधेरे में छिपी उन जड़ों से आता है जिन्हें कोई देख नहीं पाता और कई लोग भूल जाते हैं. ये जड़ें हमें याद दिलाती हैं कि टेम्स नाम ‘टेमसिस’ से आया है, जिसका मतलब होता है ‘काली नदी’. जानकारों का मानना है कि इस शब्द का और संस्कृत के ‘तमस’ (अंधेरा) का मूल एक ही है. तो जिस नदी का नाम ही ‘काली’ था, उसे दीयों से भरी एक शाम मिल गई. हो गया ना- तमसो मा ज्योतिर्गमय (अंधेरे से उजाले की ओर). उत्तराखंड और नेपाल के बीच बहने वाली ‘काली गंगा’ दोनों देशों की सीमा बनाती है. अगर टेम्स नदी भी भारतीय संस्कृति के प्रभाव क्षेत्र में बह रही होती, तो संभव है कि उसका नाम ‘काली गंगा’ होता. हर हर गंगे. हर हर काली गंगे. हर हर टेम्स. उसके तट पर हुई आरती पूरी तरह से गंगा आरती ही है. आपत्तियों को खारिज किया जाता है.
— कमलेश सिंह

यह भी पूरी तरह सम्भव है कि इस तमस (टेम्स) नदी का नाम भारत की प्रसिद्ध तमसा नदी के नाम पर रखा गया हो, जो अयोध्या के निकट है और जहाँ श्री राम ने अपने वनवास की पहली रात बितायी थी।