हमारी राजभाषा का भविष्य हमेशा जगमगाता रहेगा
हिंदी केवल अक्षरों का समुच्चय या व्याकरण के नियमों में बंधी कोई व्यवस्था नहीं है बल्कि यह हमारे भीतर धड़कते हुए उस विश्वास का नाम है जो हमारी माटी से हमारी परंपराओं से और हमारे संस्कारों से सीधे जुड़ता है जब हम राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों को अपने भीतर उतारते हैं कि निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हूल का शूल तो हमें यह स्पष्ट महसूस होने लगता है कि अपनी भाषा के बिना किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता अधूरी है आज जब हम इक्कीसवीं सदी के इस अत्यंत तीव्र और परिवर्तनों से भरे दौर में खड़े हैं तब हिंदी के भविष्य का फ़लक केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरी दुनिया में अपनी एक नई और शक्तिशाली पहचान बना रहा है
डिजिट्ल क्रांति के इस महासमुद्र में आज हिंदी ने जिस प्रकार अपनी जगह बनाई है वह अभूतपूर्व है सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों से लेकर वैश्विक सर्च इंजन और इंटरनेट की दुनिया में हिंदी पाठकों और रचनाकारों की संख्या लगातार आसमान छू रही है यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भाषाएं अपनी उपादेयता और सरलता के कारण ही जीवित रहती हैं और हिंदी में वह अद्भुत लचीलापन और सामर्थ्य है जो हर नए तकनीकी बदलाव को सहज़ता से अपना सकता है इतना ही नहीं आज दुनिया के कोने-कोने में स्थित प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा और साहित्य का पठन-पाठन बड़े गर्व के साथ किया जा रहा है संयुक्त राष्ट्र संघ के मंचों से लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक जब हिंदी गूंजती है तो हर भारतीय का मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है
किंतु इस उज्ज्वल तस्वीर के दूसरे पहलू पर भी नज़र डालना उतना ही आवश्यक है क्योंकि जब तक हम अपनी मानसिक ग़ुलामी की उन बेड़ियों को पूरी तरह से नहीं काटेंगे तब तक हमारी भाषा अपने पूर्ण वैभव को प्राप्त नहीं कर सकती आज भी समाज के एक बड़े वर्ग में अंग्रेजी को बुद्धिमत्ता और आधुनिकता का पर्याय मान लिया गया है और हिंदी को पिछड़ी सोच या हीनता का प्रतीक समझ लिया जाता है इस कुसंस्कार को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा हमें यह समझना होगा कि दुनिया के तमाम विकसित देश जैसे जापान जर्मनी रूस और चीन अपनी ही भाषा में विज्ञान तकनीक और उच्च शिक्षा के सारे द्वार खोलकर आज दुनिया का नेतृत्व कर रहे हैं और हमारे देश में भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत जब चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसी कठिन शिक्षाओं का मार्ग हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए प्रशस्त किया गया है तो यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐतिहासिक वरदान साबित हो रहा है
महादेवी वर्मा के शब्दों में कहें तो हिंदी इस राष्ट्र के प्राणों की ऐसी स्वरलिपि है जिसके बिना यहाँ की संस्कृति और संगीत दोनों ही बेमानी हो जाते हैं इसलिए हिंदी का भविष्य किसी सरकारी अधिसूचना या आदेश के भरोसे नहीं चल सकता बल्कि इसे हमारी सामूहिक जिजीविषा और आत्मीयता से सींचना होगा जब हमारे बच्चे अपनी प्राथमिक शिक्षा अपनी माटी की भाषा में प्राप्त करेंगे जब हमारे न्यायालयों और प्रशासनिक कार्यालयों में आम जनता की समझ में आने वाली हिंदी का पूर्ण सम्मान होगा और जब देश का प्रत्येक युवा अपनी मातृभाषा में संवाद करने में किसी भी प्रकार की झिझक या संकोच का अनुभव नहीं करेगा तभी हमारी राजभाषा का यह भविष्य वास्तव में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा
इस महायज्ञ में हमें केवल एक दर्शक बनकर नहीं रहना है बल्कि अपनी ओर से वह हरसंभव प्रयास करना है जिससे हिंदी के शब्दकोश और उसकी पहुंच और अधिक व्यापक बन सके क्योंकि अंततः एक भाषा का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसके बोलने वाले अपनी विरासत को लेकर कितने सजग और कृतसंकल्प हैं और जब तक हमारे दिलों में हिंदी के प्रति वह अगाध प्रेम और सम्मान जीवित है तब तक इसकी ज्योति को कोई आंधी बुझा नहीं सकती और इसका भविष्य हमेशा अनंत संभावनाओं के प्रकाश से जगमगाता रहेगा
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
