भाषा-साहित्य

उच्च न्यायपालिका में हिंदी के लिए बंद दरवाजों को धक्का देना पड़ेगा

राष्ट्रपति के आदेश 1960 में यह कहा गया था कि उचित समय आने पर सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंततः हिंदी होगी। इसी प्रकार उच्च न्यायालय के लिए भी कहा गया था कि उनकी भाषा उचित समय आने पर हिंदी अथवा राज्य की भाषा होगी। लेकिन उसे आदेश को आए हुए 66 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं किया गया है। इसलिए न केवल न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा बल्कि उसे जरूरत पड़ने पर बंद दरवाजों को धक्का देना पड़ेगा।। यह बात ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ के निदेशक एवं विशिष्ट वक्ता डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ द्वारा राजेंद्र सभागार एडवोकेट एसोसिएशन, पटना उच्च न्यायालय में आयोजित विचार गोष्ठी में कही।

हिंदी पखवाड़ा 2026 के संदर्भ में अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण समिति के सौजन्य से राजेंद्र सभागार एडवोकेट एसोसिएशन पटना उच्च न्यायालय में विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें विचार का विषय उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में हिंदी का प्रयोग था। अधिवक्ता सह पूर्व स्थाई सलाहकार संख्या 27 इंद्रदेव प्रसाद ने कहा कि -‘मैं जब से अधिवक्ता बना हूं, तभी से पटना उच्च न्यायालय में हिंदी में हिंदी में वकालत करता आ रहा हूँ और हिंदी विरोधी नियम कानून का विरोध करता आ रहा हूं जिससे संबंधित सुनवाई प्रक्रिया का एक वीडियो भी वायरल हुआ है, जिसको देखने वाले लोगों की संख्या लगभग 50 लाख है ,जिसका संज्ञान तत्कालीन केंद्रीय विधि मंत्री श्री किरण रीजीजू से लेकर बार काउंसिल आफ इंडिया एवं बिहार बार काउंसिल के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित राष्ट्रीय विचार गोष्ठी दिनांक 24 .9 .22 स्थान बापू सभागार, गांधी मैदान पटना में बोला भी है कि अब कोर्ट प्रोसीडिंग्स का भी वीडियो वायरल होता है, जिसे देखने से पता चलता है कि कुछ न्यायमूर्ति यह बोलकर हिंदी आवेदन को रोक दे रहे हैं कि मुझे हिंदी समझ में नहीं आती है ,जो ठीक नहीं है ,जो न्यायमूर्ति ठीक से हिंदी नहीं समझ पाते हैं, उन्हें हिंदी नहीं रोकना चाहिए उन्हें अनुवादक यंत्र का इस्तेमाल करना चाहिए ।

अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद ने आगे कहा कि लेकिन अनुवाद करवाने के बजाए हमें ही वकालतखाने से निकाल बाहर करने का षड्यंत्र रचा गया, उसी षड्यंत्र के अंतर्गत मेरे अधिवक्ता अनुयक्ति संख्या 315/98 को निलंबित किया गया और मेरे अधिवक्ता अनु ज्ञप्ति को निलंबित करने के लिए अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 35(3 )एवं 36 (3) की हत्या किया गया।
निलंबन अवधि समाप्त होने पर जब मैं पुनः हिंदी में वकालत प्रारंभ किया ,तब प्रभावहिंन निलंबन आदेश को प्रभावी बनाने के लिए बीसीसीआई परिवाद पत्र संख्या -1/ 2025 के अभिलेख में हेर फेर किया गया, जो संज्ञेय अपराध के अंतर्गत आता है, जिसको सहना या छिपाना उससे भी बड़ा अपराध हो सकता है , इसलिए हमने उस अपराध को छुपाया नहीं है, उन्होंने इसकी लिखित सूचना बीसीसीआई निदेशक, केंद्रीय सरकार, बिहार सरकार, अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण समिति बगैरह को दिया है।
सभाध्यक्ष श्री धर्मनाथ प्रसाद यादव ने कहा कि हिंदी में न्याय को रोकने के लिए जो अपराध इंद्रदेव जी के साथ हुआ है ,वह असहनीय है। संगठन उनके साथ खड़ा है और संविधान के दायरे में रहकर संगठन जो कुछ भी कर सकती है, कर रहा है। इनके साथ कई सामाजिक संगठन भी खड़े हैं।अखिल अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर हरपाल सिंह राणा, वैश्विक हिंदी सम्मेलन के निदेशक डॉक्टर एम.एल. गुप्ता, हिंदी सेवा निधि इटावा के महासचिव सह वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रदीप कुमार, हिंदी सलाहकार समिति भारत सरकार के माननीय सदस्य श्री वीरेंद्र कुमार यादव आदि से प्रेरणा लेकर हमने इनके मुद्दे को समिति के मुद्दों में सम्मिलित किया है, मुद्दा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में हिंदी को स्थापित करना है। उनके ही मामले में माननीय पूर्ण पीठ का फैसला आया है, जिसका पालन गलत मंशा से नहीं किया जा रहा है। राष्ट्रपति के आदेशों का उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय में पदस्थापित कुछ न्याय मूर्तियों द्वारा किया जा रहा है, इसलिए सभी संस्थाओं को एक जूट होकर इस मुद्दे पर विचार करने की जरूरत है। देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। हजारों हजार कुर्वानियां देने की जरूरत है।
वरिष्ठ अधिवक्ता श्री उमाशंकर प्रसाद ने कहा कि आंदोलन शुरू करने के लिए हजारों हजार कुर्बानियों की जरूरत नहीं है ।एक अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद हिंदी के लिए कुर्बानी देने के लिए तैयार है, जो आंदोलन को गति देने के लिए पर्याप्त है।
हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य श्री वीरेंद्र कुमार यादव ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई जी ने कहा था कि विदेशों में तो हिंदी में बात की बात की जा सकती है, किंतु अपने देश में हिंदी
विकास की बात करना बहुत कठिन कार्य है, जो इंद्रदेव जी की कहानी से सिद्ध होता हुआ प्रतीत होता है।
अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण समिति के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष श्री रणविजय सिंह ने कहा कि अब याचना नहीं ,रण होगा।महामंत्री डॉक्टर मधुसूदन राय ने कहा कि इसके लिए सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष करने की योजना बनानी ही पड़ेगी।
संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष श्री राम संदेश राय ने कहा कि आंदोलन को गति देने का माकूल समय आ गया है।हिंदी के लिए भाई इंद्रदेव प्रसाद के साथ जो कुछ भी हो रहा है, वह असहनीय है।इनके दुख के निवारण में देश के कोने-कोने में आंदोलन खड़ा करणी की रणनीति बना रही है,जिसमें आप सबका सहयोग अपेक्षित है।
उपाध्यक्ष श्री अरुण कुशवाहा ने कहा कि अंग्रेजी ना तो जजों को आती है और ना ही अधिवक्ताआओं को ठीक से आती है। जब तक न्यायपालिका की भाषा हिंदी नहीं होगी ,तब तक सबको न्याय नहीं मिलेगा ।हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों को भगाया। हम लोग अंग्रेजी को भगाएँगे।
समन्वय समिति के अध्यक्ष श्री आशुतोष जी ने कहा कि हिंदी को रोकने के लिए भाई इंद्रदेव प्रसाद के साथ जो हो रहा है, वह धीरे-धीरे सबको पता हो गया है। हम लोगों को इनके साथ खड़ा होना ही होगा ।
सभा में उपस्थित अनको विद्वान अधिवक्ता सभा को संबोधित किया और निष्कर्षत: जो यह निकला है कि अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगा, इसके लिए न केवल प्रदेश में बल्कि देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष किया जाएगा।

— डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’

डॉ. एम.एल. गुप्ता 'आदित्य'

पूर्व उपनिदेशक (पश्चिम) भारत सरकार, गृह मंत्रालय, हिंदी शिक्षण योजना एवं केंद्रीय हिंदी प्रशिक्षण उप संस्थान, नवी मुंबई

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