“बसंत” काव्य संग्रह में मुकेश कुमार ”ऋषिवर्मा’ ‘ का भाषा-सौष्ठव:
सारांश :
प्रस्तुत शोध पेपर ‘बसंत’ काव्य संग्रह की भाषा-शैली के सौंदर्य और शिल्प का विश्लेषण करता है। कवि मुकेश कुमार ‘ऋषिवर्मा’ ने सरल, सहज और जनमानस से जुड़ी भाषा का प्रयोग करते हुए भी काव्य के प्रमुख तत्वों—छंद, अलंकार, रस और शब्द-वैविध्य (तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी)—का कुशल संयोजन किया है। यह शोध पत्र कवि की भाषा में व्यंग्य, करुणा और आध्यात्मिक गूढ़ता के संतुलन को स्थापित करता है।
बीज शब्द : भाषा-सौष्ठव, छंद, अलंकार, रस, शब्दावली, शैली, भाषाविज्ञान
- प्रस्तावना :
भाषा-सौष्ठव काव्य का वह तत्व है जो कवि के भावों को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करता है। मुकेश कुमार ‘ऋषिवर्मा’ की कविताएँ इस दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं, जिनमें ग्रामीण जीवन की मिट्टी की सोंधी महक और आधुनिक साहित्यिक तकनीक का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। इस शोध पत्र में भाषा विज्ञान के मानक सिद्धांतों के आधार पर कवि की भाषा-शैली का विश्लेषण किया गया है। - भाषा :
भाषाविज्ञान के अनुसार, भाषा ध्वनियों, पदों और वाक्यों का समूह मात्र नहीं, बल्कि एक सजीव संप्रेषण माध्यम है । ‘ऋषिवर्मा’ की भाषा सरल, सहज और स्वाभाविक है। उन्होंने कहीं अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ (तत्सम) शब्दों का प्रयोग किया है, तो कहीं लोकभाषा (तद्भव-देशज) को अपनाया है। उनकी भाषा में ‘खड़ी बोली’ की प्रधानता है, लेकिन बृज और अवधी के प्रभाव के कारण मिठास भी घुली हुई है।
उदाहरण (कविता: “होली आई”):
“मधुमय, मधुऋतु आई
फाग की रंगीली बहार आई
हर चेहरे पर नव मुस्कान छाई
सुखदायी ऋतु आई रे।आई
होली आई
संदर्भ: यहाँ ‘मधुमय’, ‘मधुऋतु’, ‘फाग’, ‘बहार’ जैसे शब्द भाषा को सहज और सरस बनाते हैं। प्रश्नवाचक शैली (जैसे “हे प्रभु!”) भाषा को गहन विचारोत्तेजक बना देती है। - शब्दावली: तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी :
भाषाविज्ञान में “शब्दावली” का अर्थ है—किसी विषय या क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाले शब्दों का संग्रह या समूह । कवि की शब्दावली में विविधता है; उन्होंने गंभीर भावों के लिए तत्सम शब्दों का प्रयोग किया, ग्राम्य जीवन के चित्रण के लिए तद्भव, और आधुनिकता का बोध कराने के लिए विदेशी शब्दों का सहारा लिया ।
· तत्सम शब्द: “पतितपावनी मां यमुना को निर्मल पुनः बनाएं।” (कविता: “मां यमुना”) — ‘पतितपावनी’, ‘निर्मल’ तत्सम हैं।
· तद्भव शब्द: “मुझको अच्छा लगता है / सुबह-सुबह चिड़ियों का चहकना।” (कविता: “मुझको अच्छा लगता है”) — ‘चिड़िया’, ‘चहकना’ तद्भव हैं।
· देशज शब्द: “बहिना का मन हर्षाती राखी।” (कविता: “राखी”) — ‘बहिना’ देशज शब्द है, जो लोक जीवन की मिठास को दर्शाता है।
· विदेशी शब्द: “चिल्लरों में खरीद लो मुझे / मैं गरीवी में पला-बढ़ा साहित्यकार बना।” (कविता: “बिकाऊ साहित्यकार”) — ‘चिल्लर’ (अरबी) विदेशी शब्द है, जो भौतिक समाज की सच्चाई को उजागर करता है।
संदर्भ: कवि की शब्द-चयन की कला उनकी भाषा-सौष्ठव को सर्वोच्च स्तर पर स्थापित करती है - छंद :
छंदशास्त्र काव्य में वर्णों या मात्राओं के नियमबद्ध प्रयोग का सिद्धांत है । कवि ने मुक्त छंद का अधिक प्रयोग किया है, जो भावनाओं के स्वतंत्र प्रवाह को सही रूप देता है। लेकिन सम-मात्रिक छंदों का भी सफल प्रयोग हुआ है।
· मुक्त छंद का उदाहरण (कविता: “गिद्ध”):
“गिद्ध मस्त है,
गिद्ध व्यस्त है
नोच खा रहा है
और अपनी बिरादरी को भी
भरपेट खिला रहा है..
बाकी बचा खुचा
स्विस बैंक में जमा करा रहा है।
· लयबद्ध छंद का उदाहरण (कविता: “सच्ची होली”):
“तन रेंगा बहुतों ने
मन जो रंगे
तब हो सच्ची होली।”
संदर्भ: लघु पंक्तियों और समान लय के कारण कविता गेय बन गई है, जबकि मुक्त छंद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कवि के व्यंग्य को तीव्र करती है। - अलंकार :
अलंकार काव्य को चमत्कारिक बनाने वाला सौंदर्य तत्व है। कवि ने अनुप्रास, यमक, उपमा, रूपक और व्यंग्य जैसे अलंकारों का सजीव प्रयोग किया है।
· अनुप्रास (Alliteration): “फर-फर फड़फड़ाकर उड़ना” (कविता: “मुझको अच्छा लगता है”) — ‘फ’ वर्ण की पुनरावृत्ति से पक्षियों की उड़ान का चित्रण हुआ है।
· उपमा (Simile): “झर-झर झरती बूंदें मोती जैसी” (कविता: “सावन को बरसते देखा है”) — बूंदों की तुलना मोतियों से की गई है।
· रूपक (Metaphor): “तम से घिरी हृदय कुटिया” (कविता: “हे दयावान!”) — हृदय को ‘कुटिया’ रूप में प्रस्तुत किया गया है।
· मानवीकरण (Personification): “प्रकृति दुल्हन बन आई” (कविता: “बसंत”) — प्रकृति को दुल्हन के रूप में चित्रित किया गया है।
· व्यंग्य (Satire): “दुश्मन को बाप बना लेते हैं और दोस्त को धूल चटा देते हैं” (कविता: “दिमाग”) — समाज के चालाक लोगों पर तीखा कटाक्ष है।
संदर्भ: अलंकारों का यह कुशल प्रयोग पाठक को भावनात्मक और बौद्धिक दोनों स्तरों पर प्रभावित करता है। - रस :
रस काव्य की आत्मा है। कवि ने श्रृंगार (प्रेम), करुणा (दुख), वीर (साहस) और हास्य/व्यंग्य (असुर) का सहज प्रवाह अपनी रचनाओं में दिया है।
· श्रृंगार रस
“गोरी की आंखों में मदिरा का नशा
मृदुल-मनोरम अमृत छलकाती बातें”
(कविता: “सावन को बरसते देखा है”) — सावन में नायिका के सौंदर्य का श्रृंगारिक वर्णन है।
· करुणा रस
“दो जून की रोटी
यों ही नहीं मिलती
कोई कड़ी धूप में चलाए फावड़ा”
(कविता: “दो जून की रोटी”) — मजदूर की दुर्दशा पर हृदय पिघल जाता है।
· वीर रस
“राम उठो कृष्ण उठो
धनुष-चक्र चलाने का समय है
मानवता बचानी है
तो मर्यादा तोड़नी होगी”
(कविता: “राम उठो- कृष्ण उठो”) — अधर्म के विरुद्ध विद्रोह का वीर भाव उभरता है।
संदर्भ: रसों का यह बहुरंगी प्रयोग कवि की सशक्त सर्जनात्मक क्षमता को प्रमाणित करता है। - शैली :
शैली कवि की विचार-अभिव्यक्ति का विशिष्ट ढंग है, जो उसके व्यक्तित्व और दृष्टिकोण का द्योतक होती है। कवि की शैली मुख्यतः वर्णनात्मक, व्यंग्यात्मक, आत्मपरक और दार्शनिक है।
· वर्णनात्मक शैली:
“पूरब में लाल-सुनहरे सूरज का निकलना
नन्हें-नन्हें पौधों से ओस का झरना”
(कविता: “मुझको अच्छा लगता है”) — प्रकृति का सजीव चित्रण है।
· आत्मपरक/वेदना शैली:
“मैं जिसे हृदय में धड़काता हूं
वो कविता तुम्हें सुनाता हूं”
(कविता: “जो कभी न डूबे”) — कवि अपने हृदय की वेदना को साझा कर रहा है।
· दार्शनिक शैली:
“समय बड़ा बलवान
और धोखेबाज भी
यह किसी के लिए नहीं रुकता”
(कविता: “समय”) — जीवन की सच्चाई को दार्शनिक दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
· संवाद शैली:
“हे प्रभु! दया करो
मन मेरा भटका
इसको सुधारो”
(कविता: “हे प्रभु! दया करो”) — कवि सीधे ईश्वर से संवाद कर रहा है।
संदर्भ: कवि की इस बहुआयामी शैली ने उन्हें आम पाठक और आलोचकों दोनों का प्रिय बनाया है - चित्रात्मकता और बिंब-विधान
‘बसंत’ की भाषा में चित्रात्मकता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कवि शब्दों के माध्यम से ऐसे दृश्य उपस्थित करता है जिन्हें पाठक मानसिक रूप से देख और अनुभव कर सकता है।
‘मुझको अच्छा लगता है’ में पक्षियों का चहकना, पत्तियों का हिलना, सूर्योदय और ओस की बूँदें प्रकृति का सजीव चित्र उपस्थित करते हैं। ‘सावन को बरसते देखा है’ तथा ‘सावन में’ में वर्षा ऋतु के दृश्यात्मक बिंब मिलते हैं।
‘भोर सुनहरी’ में भोर केवल दिन के आरंभ का संकेत नहीं रहती, बल्कि आशा, नवीनता और संभावनाओं का बिंब बन जाती है। इस प्रकार दृश्यात्मकता भाषा को मूर्त और प्रभावशाली बनाती है। - प्रतीकात्मकता
‘बसंत’ के भाषा-सौंदर्य में प्रतीकात्मकता का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। ‘बसंत’ स्वयं नवजीवन, आशा, परिवर्तन और नई चेतना का प्रतीक बन जाता है। ‘दीप’ अंधकार के विरुद्ध प्रकाश, ज्ञान और आशा का प्रतीक है। ‘सूरज’ नई चेतना और भविष्य की संभावना का संकेत देता है।
‘गिद्ध’ शोषक और अवसरवादी मानसिकता का प्रतीकात्मक रूप ग्रहण करता है, जबकि ‘नफरती नाग’ घृणा फैलाने वाली प्रवृत्तियों को संकेतित करता है। इस प्रकार सामान्य शब्द व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। - मुहावरे और लोकोक्तिपरक प्रयोग
‘बसंत’ की भाषा में मुहावरेदार और लोकोक्तिपरक अभिव्यक्तियाँ कविता को लोकजीवन के निकट ले जाती हैं। ‘दो जून की रोटी’, ‘आस्तीन के सांप’, ‘अपने तो अपने होते हैं’ आदि प्रयोग सामान्य जन के अनुभव-संसार से जुड़े हैं।
मुहावरे कम शब्दों में व्यापक अर्थ व्यक्त करने की क्षमता रखते हैं। इनके प्रयोग से भाषा में संक्षिप्तता, व्यंजना और प्रभावशीलता आती है
11.लोक और आधुनिकता का समन्वय
‘बसंत’ की भाषा में परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। ‘चिट्ठियों वाले दिन’ में पत्रों से जुड़ी पुरानी आत्मीयता और आधुनिक डिजिटल संचार के बीच का अंतर अनुभव किया जा सकता है।
एक ओर कवि राम, कृष्ण, वेद, यमुना और दयानंद जैसे सांस्कृतिक संदर्भों को ग्रहण करता है, दूसरी ओर पर्यावरण, सामाजिक विषमता, आर्थिक व्यवस्था और आधुनिक जीवन की समस्याओं को भी अपनी कविता का विषय बनाता है।
इस प्रकार उसकी भाषा परंपरा से जुड़ते हुए आधुनिक संवेदना को अभिव्यक्त करती है।
- जनपक्षधरता
कवि की भाषा का एक महत्त्वपूर्ण गुण उसकी जनपक्षधरता है। किसान, श्रमिक, गरीब, स्त्री, शोषित और सामान्य व्यक्ति उसके काव्य-संसार में उपस्थित हैं।
‘कृषक दुर्दशा’ किसान की पीड़ा को, ‘दो जून की रोटी’ श्रमिक जीवन के संघर्ष को तथा ‘दहेज प्रथा’ स्त्री की सामाजिक स्थिति को अभिव्यक्ति देती है। इन कविताओं में भाषा सामान्य जन के अनुभवों से जुड़ती है।
कठिन सामाजिक प्रश्नों को सहज भाषा में प्रस्तुत करना कवि की संप्रेषणीयता को प्रभावी बनाता है।
निष्कर्ष :
समग्र रूप से कहा जा सकता है कि डॉ. मुकेश कुमार ‘ऋषिवर्मा’ के काव्य-संग्रह ‘बसंत’ का भाषा-सौष्ठव उसकी सहजता, संप्रेषणीयता, भावानुकूलता, शब्द-वैविध्य और विषय-विस्तार में निहित है। कवि ने तत्सम, तद्भव, देशज, लोकप्रचलित तथा विदेशी शब्दावली का प्रसंगानुकूल प्रयोग किया है। उसकी भाषा में खड़ी बोली की प्रधानता के साथ लोकजीवन की सहजता और सांस्कृतिक चेतना का समावेश दिखाई देता है।
प्रकृति-काव्य में चित्रात्मकता, बिंब-विधान और मानवीकरण; सामाजिक कविताओं में व्यंग्य, मुहावरेदार अभिव्यक्ति और प्रहारात्मकता; आध्यात्मिक कविताओं में संबोधन, विनय और प्रार्थना; तथा दार्शनिक कविताओं में प्रश्नात्मकता, विरोधाभास और चिंतनपरकता भाषा को बहुआयामी बनाती है।
मुक्त छंद की स्वतंत्रता तथा लयबद्ध अभिव्यक्ति की गेयता दोनों का प्रयोग कवि ने अपनी आवश्यकता के अनुरूप किया है। अनुप्रास, उपमा, रूपक और मानवीकरण जैसे अलंकार तथा श्रृंगार, करुण और वीर आदि रस कविता की अभिव्यक्ति को प्रभावपूर्ण बनाते हैं।
‘बसंत’ की भाषा में लोक और आधुनिकता, परंपरा और परिवर्तन, संवेदना और सामाजिक चेतना का समन्वय है। ‘बसंत’ स्वयं नवजीवन और नई चेतना का प्रतीक बन जाता है, जबकि ‘दीप’, ‘सूरज’, ‘गिद्ध’, ‘नाग’, ‘तिरंगा’ और ‘यमुना’ जैसे शब्द अपने सामान्य अर्थ से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण करते हैं।
निष्कर्षतः ‘बसंत’ की भाषा को सहज, संवेदनशील, संप्रेषणीय, विचारोत्तेजक, लोकनिकट और काव्यात्मक भाषा कहा जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कवि जटिल सामाजिक और मानवीय प्रश्नों को भी अपेक्षाकृत सरल भाषा में पाठक तक पहुँचाता है। यही भाषिक सहजता उसकी काव्यात्मक प्रभावशीलता का आधार बनती है और ‘बसंत’ को समकालीन हिंदी काव्य में अध्ययन योग्य कृति के रूप में प्रस्तुत करती है।
संदर्भ सूची :
प्राथमिक स्रोत :
- मुकेश कुमार ‘ऋषिवर्मी’, बसंत (काव्य संग्रह), काम्बोज बुक पब्लिशर, नई दिल्ली-110030।
उद्धृत कविताएँ एवं पृष्ठ-संदर्भ - ‘मुझको अच्छा लगता है’ — पृष्ठ 9
- ‘सावन को बरसते देखा है’ — पृष्ठ 14
- ‘नफरती नाग’ — पृष्ठ 15
- ‘गिद्ध’ — पृष्ठ 19
- ‘दहेज प्रथा’ — पृष्ठ 20
- ‘दीप जलाएं’ — पृष्ठ 22
- ‘जल’ — पृष्ठ 24
- ‘कृषक दुर्दशा’ — पृष्ठ 28
- ‘होली आई’ — पृष्ठ 30
- ‘सावन में’ — पृष्ठ 33
- ‘मनुष्य और प्रकृति’ — पृष्ठ 43
- ‘चिट्ठियों वाले दिन’ — पृष्ठ 48
- ‘सच्ची होली’ — पृष्ठ 50
- ‘शिक्षा’ — पृष्ठ 53
- ‘दो जून की रोटी’ — पृष्ठ 54
- ‘बाबाओं की फौज’ — पृष्ठ 55
- ‘राखी’ — पृष्ठ 57
- ‘हे प्रभु! दया करो’ — पृष्ठ 61
- ‘हे दयावान!’ — पृष्ठ 62
- ‘भोर सुनहरी’ — पृष्ठ 65
- ‘राम उठो- कृष्ण उठो’ — पृष्ठ 79
- ‘समय बड़ा बलवान’ / ‘समय’ — पृष्ठ 78–80
- ‘ये सच है’ — पृष्ठ 87
- ‘कैसा ये जीवन’ — पृष्ठ 88
- ‘नई सदी का सूरज’ — पृष्ठ 90
- ‘चौर्यकला’ — पृष्ठ 91
- ‘माँ यमुना’ — पृष्ठ 92
- ‘युद्ध’ — पृष्ठ 94
- ‘साथ’ — पृष्ठ 96
- ‘बिकाऊ साहित्यकार’ — पृष्ठ 97
- ‘तिरंगा’ — पृष्ठ 99
- ‘दिमाग’ — पृष्ठ 100
- ‘सद्भाव’ — पृष्ठ 104
- ‘बसंत’ — पृष्ठ 105
- ‘दुःख’ — पृष्ठ 106
- ‘करुणा का रस’ — पृष्ठ 108
- ‘युद्ध की आग’ — पृष्ठ 109
- ‘दयानंद मतवाला’ — पृष्ठ 111
भाषा विज्ञान एवं साहित्यशास्त्र के ग्रंथ : - द्विवेदी, डॉ. कपिलदेव, भाषा विज्ञान एवं भाषा शास्त्र, विश्वविद्यालय प्रकाशन, 20वां संस्करण, 2025, पृष्ठ 512, ISBN: 978-93-5146-042-8।
- चौधरी, डॉ. तेजपाल, समाज भाषा विज्ञान की भूमिका, पंचशील प्रकाशन, द्वितीय संस्करण, 2006, ISBN: 81-7056-112-4।
- सिंह, सुधा, भाषा विज्ञान के सिद्धांत, शिवांक प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृष्ठ 147, ISBN: 9789387774063।
- तिवारी, भोलानाथ, हिंदी व्याकरण रचना एवं छंदशास्त्र, दिल्ली सस्ता साहित्य निकेतन, 1संस्करण, 2014, पृष्ठ 336, ISBN: 8190224557।
— डॉ राजपाल
हिंदी विभाग
गुरु गोरखनाथ जी
राजकीय महाविद्यालय हिसार
हरियाणा
