जिम्मेदारी का तराजू
बचपन की वह मासूम सी बातें,
अब पीछे छूटने लगी हैं,
ख्वाबों की नाजुक सी डोरियाँ,
वक्त के साथ टूटने लगी हैं।
बाजार की इस दुनिया में अब,
हर एक रिश्ता बिकता है,
जहाँ जेब अगर खाली हो,
तो अपना भी पराया दिखता है।
कमाना शुरू कर लो बेटा,
अभी तो जीवन में पड़ेंगे खरीदने,
मां बाप भाई बहन,
वर्ना जिंदगी अपने आप तक पड़ेंगे समेटने।
जब तक पास में पैसा है,
तब तक महफिल में मेले हैं,
दाम बिना इस दुनिया में,
हम और तुम बिल्कुल अकेले हैं।
कर्तव्यों का बोझ उठाने को,
अब कंधों को मजबूत करो,
भीड़ बहुत है इस दुनिया में,
अपनी पहचान को सिद्ध करो।
अगर वक्त रहते संभले न तुम,
तो अकेले ही रह जाओगे,
चाह कर भी अपनों की खातिर,
कुछ भी न तुम कर पाओगे।
रिश्तों की कीमत चुकानी है,
तो खुद को काबिल बनाना होगा,
इस जीवन के हर एक मोड़ पर,
मेहनत का दीप जलाना होगा।
— राजेन्द्र लाहिरी
