पहले गांव था अब है नदी
प्रकृति से करने चला था मुकाबला
बड़ा सा घर रेत की तरह ढह गया
अब तो केवल नदी नज़र आती है वहां
गांव तो तिनके की तरह बह गया
तिनके की तरह उड़ गया टिक नहीं पाया
प्रकृति ने मानव को बहुत समझाया
फिर भी कर रहा अपनी मनमानी
जानबूझ कर सब का कर रहा सफाया
प्रकृति जब लगी अब लेने इंतक़ाम
तब लगा याद आने भगवान का नाम
कल तक जो समझता था खुद को बड़ा
थर थर कांप रहा जब आफत में फंसी है जान
आदमी का कुछ ऐसा ही बन गया है स्वभाव
अपने आपको समझने लगा है नबाब
कुदरत को तो कुछ मानता ही नहीं
जमीन अच्छी नहीं लगती उड़ने के देखता रहता ख्वाब
पहाड़ खोदे,पेड़ काटे सड़कें बनवाई
बैठे बिठाए ले ली प्रकृति से लड़ाई
प्रकृति से मत करो खिलवाड़ सबने समझाया
पर यह बात एहंकारी की समझ में न आई
प्रकृति देती है सबको भरपूर प्यार
बिना बात के नहीं करती कभी किसी से तकरार
लेकिन जब कोई लगे सिर पर बैठकर नाचने
तो देरी नहीं करती झट से देती है उसका भूत उतार
— रवींद्र कुमार शर्मा
