ज़िंदगी के इस सफ़र में कोई मंज़िल है ही नहीं
ज़िंदगी वाक़ई एक ऐसा अनसुना सफ़र है, जिसका न कोई तयशुदा नक़्शा है और न ही यह मालूम है कि यह किस मोड़ पर थम जाएगी।
ज़िंदगी महज़ सांसों के आने-जाने का नाम नहीं, यह एक ऐसा मुसलसल सफ़र है जिसका कोई आगाज़ तो है, मगर अंजाम किसी को मालूम नहीं। हम सब एक ऐसी राह के मुसाफ़िर हैं, जहाँ हर नया क़दम एक नया इम्तहान और हर मोड़ एक अनसुनी दास्तान बन कर सामने आता है।
अक्सर हम उम्र भर किसी ‘मंज़िल’ की तलाश में भागते रहते हैं,यह सोचते हुए कि शायद किसी मक़ाम पर पहुँच कर यह तलाश ख़त्म हो जाएगी। मगर सच तो यह है कि इस सफ़र में कोई मंज़िल है ही नहीं। ज़िंदगी ख़ुद अपने आप में एक मु मुकम्मल मंज़िल है। अगर ठहरना ही सब कुछ होता, तो रास्ते कभी बनाए ही न जाते। असल ख़ूबसूरती तो इस बात में है कि मुसाफ़िर चलते रहना सीख ले, फ़िर चाहे राह कितनी भी पुर-पेच (उलझन भरी) क्यों न हो।
कहाँ, कब और कैसे यह सफ़र तमाम (खत्म) होगा, इसका इल्म तो बस वक्त के मुहाफ़िज़ को ही है। हमारे इख़्तियार में सिर्फ़ इतना है कि हम इस बे-नाम सफ़र को किस शिद्दत, किस मोहब्बत और किस सुकून से गुज़ारते हैं। अंधेरों से डर कर रुक जाने के बजाए, हर क़दम पर रौशनी की तलाश करना ही इस सफ़र का असली हुनर है।
”सफ़र जारी रखो कि मंज़िल ख़ुद ब ख़ुद रास्तों में ढल जाएगी,
जो ठहर गए वो थक गए, जो चल दिए वो अमर हुए।”
अंततः, यह मुसाफ़िरत ही हमारी पहचान है। मंज़िल की फिक्र छोड़कर, इस हसीन सफ़र के हर लम्हे को जीना ही ज़िंदगी का असल फ़लसफ़ा है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
