लघुकथा – आख़िरी निवाला
रेलवे स्टेशन की ठिठुरती रात में ठंड सिर्फ शरीर नहीं, इंसानियत भी जमा रही थी। लोग गर्म कपड़ों में लिपटे
Read Moreरेलवे स्टेशन की ठिठुरती रात में ठंड सिर्फ शरीर नहीं, इंसानियत भी जमा रही थी। लोग गर्म कपड़ों में लिपटे
Read More“उफ्! ये चीटियाँ गर्मी आते ही बहुत परेशान करती हैं। रसोईघर तो है ही इनकी जागीर। अब किताबों की अलमारी
Read Moreएक बार एक व्यक्ति कुछ पैसे निकलवाने के लिए बैंक में गया। जैसे ही कैशियर ने पेमेंट दी, कस्टमर ने
Read Moreडॉ. विनोद शर्मा ने छत्तीस घंटे जागकर परीक्षा दी थी। रैंक आई — 47वीं। सीट नहीं मिली।जिसे मिली, उसकी रैंक
Read Moreघर में सब कुछ था—सुविधाएँ, सुकून और व्यवस्थित दिनचर्या…बस, जो नहीं था, वह था उस व्यक्ति का नाम, जिसके बिना
Read More“विनी मुझे मेरा घर मेरा सा ही नहीं लगता अब…” सिया की निराश हताश भरी आवाज मुझे अंदर तक झकझोर
Read Moreविदेश से मायके पहुंची बेटी सुबह अपने बेटों की फरमाइश पूरी करने में जुटी है। श्रुति के पूछने पर नाश्ते
Read More“क्या हुआ निखिल? इतनी दूर से क्या इशारा कर रहे हो… कुछ समझ नहीं आ रहा।” कहकर नंदिनी फिर कार्यक्रम
Read Moreगर्मी अपने चरम पर थी। धूप मानो धरती को तपाकर उसकी सहनशक्ति को परख रही थी। सड़कें सन्नाटे में डूबी
Read Moreजिले में एक ईमानदार अफसर की नियुक्ति हो गयी। बिना घूस लिये काम करता। दलाली एक रूपये की नहीं। बड़ा
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