Author: *सविता सिंह 'मीरा'

कविता

एक अमिट शृंगार

नभ-मण्डल से उतरी ज्योत्स्ना,रची विधाता ने यह तृष्णा।तुम अनंत शृंगार-प्रतीक,गरिमामय सौन्दर्य अतीक॥ अचल आस्था के आधार,मम स्वप्नों के भव्य आकार।नक्षत्रों

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