हरश्रृंगार धरा पर बिखर गई
काश! कहीं कोई ऐसा हो,जो बनकर आधार सँभाले,थककर जब यह जीवन बिखरे,मौन स्नेह से गले लगा ले। रजनी भर महकी
Read Moreकाश! कहीं कोई ऐसा हो,जो बनकर आधार सँभाले,थककर जब यह जीवन बिखरे,मौन स्नेह से गले लगा ले। रजनी भर महकी
Read Moreचंचल बारिश अब आकरटीस दिल में जगा गईबिरहन फिर से मचल उठीनीर भी आग लगा गई। बैठी नदी के कूल
Read Moreवीर नहीं तुम सा जग में प्रभु,गूंज रहा जयकार तिहारा।हाथ धरो मम शीश महा प्रभु,कोउ नहीं बिन आप हमाराएकहि मुष्टिक
Read Moreथम थम कर क्यों बज रही, पायल तेरी बोल।झुमकी धरती पर मिली,राज जरा तू खोल।। छेड़ नहीं मुझको प्रिये,जाने तू
Read Moreकभी-कभी जीवन की सबसे खूबसूरत यात्राएँ बहुत दूर जाकर नहीं, बल्कि अपने ही आसपास की पगडंडियों पर मिल जाती हैं।
Read Moreभादो की तिथि अष्टमी, प्रकट हुए गोपाल।जन मन हर्षित देखकर, गोद नंद के लाल।। मोहन तू ही आत्मधन,प्रभु तू ही
Read Moreएक ढलती संध्या, दर्पण किया साफ़,उसने कहा, “देर से ही सही, आ गई पास।आई हो अब, जब घिर आई है
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