कहो ना…
क्यों प्रतीत होता है ऐसा,कि वह अशरीरीहोकर भी सर्वत्र है। प्रातः की उनअर्द्ध-उन्मीलित पलकों में,धूमिल सुगन्धित समीर केउन झोंकों में,जो
Read Moreमन में भरकर प्रीत तुम,कैसे रखते धीर ?सुन ओ मेरे रांझिया,व्याकुल तेरी हीर ।। श्वास श्वास में तुम बसे,तुम ही
Read Moreनव जलधारा अवतरित धरा पर,सिक्त हुआ अंतर्मन,विकसित हुईं हृदय-कलिकाएँ,सुरभित गृह-प्रांगण। अव्यक्त भाव हैं अंतस में,विरह-वेदना तज देना,नव आगमन हो तो
Read More“क्या हुआ निखिल? इतनी दूर से क्या इशारा कर रहे हो… कुछ समझ नहीं आ रहा।” कहकर नंदिनी फिर कार्यक्रम
Read Moreहर रोज़ ये चाँदगगन से उतरकरमेरी मुंडेर पर आकरपर्दों में उलझ जाता है। वो आता है संदेश लिएकिसी के उस
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