सिंदूरी स्वप्न
पलकों में जो छुपा हुआ था,वह पैगाम सुनहरा है।आज खुला है राज हृदय का,रंग यह बेहद गहरा है।अधरों का वह
Read Moreपलकों में जो छुपा हुआ था,वह पैगाम सुनहरा है।आज खुला है राज हृदय का,रंग यह बेहद गहरा है।अधरों का वह
Read Moreमैं हूँ स्त्री, मैं ही पुरुष, अर्द्धनारीश्वर की हूँ कृति,फिर क्यों जग के इस आँगन में, होती हमारी दुर्गति? हाँ
Read Moreशुष्क है यह भग्न उरनीर नयनों में भराताप विरहाग्नि सहे,कंपित हुई यह धरा।तिमिरमय इस चेतना मेंभोर फिर से क्या उगेगी?तृप्ति
Read Moreआज फिर वही रस, वही तृप्ति,युगों बाद जागी वह सुवास,या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,जिसकी लगी रहती है आस। कतिपय
Read Moreबचपन की कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि और अधिक चमकने लगती हैं। वे याद आते ही
Read Moreशब्द ब्रह्म बौना लगे, रीते सकल विधान।माँ के पावन चरण में, झुके स्वयं भगवान॥” स्त्री का आँचल हो या पुरुष
Read Moreसोचती हूँ, तुम्हें श्वेत पन्नों पर उतार दूँ,मगर मेरी लेखनी की सामर्थ्यहर बार कम रह जाती है। चाहा कि बाँध
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