उफ्फ्फ! यह चाय
आज फिर वही रस, वही तृप्ति,युगों बाद जागी वह सुवास,या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,जिसकी लगी रहती है आस। कतिपय
Read Moreआज फिर वही रस, वही तृप्ति,युगों बाद जागी वह सुवास,या कोई गुप्त रहस्य छिपा है,जिसकी लगी रहती है आस। कतिपय
Read Moreबचपन की कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि और अधिक चमकने लगती हैं। वे याद आते ही
Read Moreशब्द ब्रह्म बौना लगे, रीते सकल विधान।माँ के पावन चरण में, झुके स्वयं भगवान॥” स्त्री का आँचल हो या पुरुष
Read Moreसोचती हूँ, तुम्हें श्वेत पन्नों पर उतार दूँ,मगर मेरी लेखनी की सामर्थ्यहर बार कम रह जाती है। चाहा कि बाँध
Read Moreमन में भरकर प्रीत तुम,कैसे रखते धीर ?सुन ओ मेरे रांझिया,व्याकुल तेरी हीर ।। श्वास श्वास में तुम बसे,तुम ही
Read Moreनव जलधारा अवतरित धरा पर,सिक्त हुआ अंतर्मन,विकसित हुईं हृदय-कलिकाएँ,सुरभित गृह-प्रांगण। अव्यक्त भाव हैं अंतस में,विरह-वेदना तज देना,नव आगमन हो तो
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