कविता

संयम की शक्ति और कलम की धार

क्रोध बड़ा नहीं होता
बड़े होते हैं संयत आचार, व्यवहार,
एक अदने से कलम के आगे
झुकती आयी है लाखों तलवार,

संयम के कारण गौतम बुद्ध
और सम्राट अशोक महाप्रतापी कहलाये,
हिंसा की जलती ज्वाला में
वे शांति का शीतल दीप जलाये,

क्रोध सदा ही अंधकार है
जो अपनों का ही घर डसता है,
पर धीरज का एक छोटा पल
जिंदगी में नित जीवन रस भरता है,

वाणी का संयम सबसे बड़ा
जो टूटे दिलों को जोड़ देता है,
सच्चा योद्धा तो वह है मित्रों
जो अपनी इंद्रियों को मोड़ देता है,

इतिहास गवाह है युद्धों से
बस मिटती केवल मानवता है,
पर प्रेम और संतोष भाव से
मानव नाम अमर कर जाता है,

आक्रोश तो पल भर का सैलाब है
जो सब कुछ नष्ट कर जाता है,
पर गहरे सागर सा धीरज
मोती की फसल उगाता है,

चमचमाती तीखी तलवारें भी
एक दिन जंग में खो जाती हैं,
पर महापुरुषों की पावन सीखें
अमर ग्रन्थ बन गाती हैं,

अहंकार के ऊँचे पर्वतों को
विनम्रता ही सदा झुकाती है,
क्रोध की हर एक चिंगारी
संयम की नदियाँ बुझाती हैं,

तू रख भरोसा अपने विवेक पर
यही तेरी सच्ची पहचान है,
जो जीत ले खुद के गुस्से को
उन्हें नाम अमरत्व वरदान है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554