Author: राजेन्द्र लाहिरी

कविता

दुनिया नहीं खुद को बदलो

ऐ पुरूष नहीं चाहिए मुझेतुम्हारी संपत्तिमगर हां परंपरा और संस्कृति के नाम परअपने सम्मान से सौदाबिल्कुल नहीं करूंगी,चाहे बिखर जायेतुम्हारे

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