यादों के झरोखों से निकला एक अफ़साना
वक्त की धूप-छांव और पगडंडियों से गुजरते हुए ज़िंदगी कब एक ऐसे मोड़ पर आ पहुँचती है, जहाँ सिवाय अहसासों
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Read Moreकैसे हो तुम? उम्मीद है तुम्हारी दुनिया अब भी उसी मद्धम सी रोशनी और सुकून भरी ख़ामोशी में बसती होगी,
Read Moreबचपन की यादें किसी सहेज कर रखी गई धरोहर जैसी होती हैं, जिन्हें छू भर लेने से समय की कई
Read Moreजीवन में कुछ पड़ाव ऐसे होते हैं, जिन्हें हम पीछे छोड़ तो आते हैं, लेकिन वे कभी हमारे भीतर से
Read Moreकभी-कभी जीवन की सबसे खूबसूरत यात्राएँ बहुत दूर जाकर नहीं, बल्कि अपने ही आसपास की पगडंडियों पर मिल जाती हैं।
Read Moreबाप जब भी दारू पीकर घर आता, मुझसे एक ही बात कहता ” बेटा, मैं तुम्हारा दिया नहीं उडाता हूं
Read Moreबात उन दिनों की है जब कैलेंडर के पन्ने साल 1982 पर ठहरे हुए थे। मैं श्री नीलकंठेश्वर महाविद्यालय, खंडवा
Read Moreकॉलेज का पहला दिन आज भी याद है। नए चेहरे, नई कक्षाएँ और दिल में अनगिनत सपने। शुरुआत में सब
Read Moreशिक्षकीय जीवन में प्रतिदिन न जाने कितने चेहरे सामने आते हैं। कुछ चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं,
Read Moreसाहित्यिक पटलों के माध्यम से संपर्क में आने और महज दो-तीन बार के आभासी संवाद के बाद नीलिमा ने राज
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