संस्मरण

बलड़ी (हरसूद) की वह भौतिक धरती नर्मदा मैया की गोद में विश्राम कर रही है

हमारी स्मृतियों की नदी जब बहती है, तो वह केवल शब्दों को नहीं, बल्कि एक पूरे कालखंड को जीवंत कर देती है। पुराने हरसूद की तहसील का वह गौरवशाली गाँव बलड़ी, जो आज नर्मदा के अथाह जल में समाया हुआ है, यादों के जरिए एक बार फिर अपनी पूरी भव्यता के साथ यहाँ उभर रहा है। एक फिल्म के स्क्रीन की तरह।
यहाँ आपकी भावनाओं, स्थानों की विशिष्टता और उस दौर की संस्कृति को समेटता हुआ एक आलेख प्रस्तुत है।
स्मृतियों का बलड़ी, एक गाँव जो दिल में धड़कता है
दुनिया के नक्शे पर शायद वह स्थान अब ‘डूब क्षेत्र’ कहलाता हो, लेकिन हमारे ज़ेहन में बलड़ी (हरसूद) आज भी वैसा ही आबाद है,वही सोंधी मिट्टी, वही ऊंचे सागौन के पेड़ और वही अपनत्व से भरी गलियाँ। वह गाँव हमारा सबका प्यारा था, क्योंकि वहाँ रिश्तों में कोई दरार नहीं थी।
प्रकृति और परिवेश,,,जहाँ सुकून बसता था
बलड़ी की सुबह नर्मदा नदी की शीतल लहरों और अमराई में कोयल की कूक से शुरू होती थी। वह बावड़ी जिसका पानी अमृत समान था, और वह स्कूल जहाँ शिक्षकों के अनुशासन ने हमें गढ़ना सिखाया। गाँव की चौपाल पर होने वाली चर्चाएं किसी संसद से कम नहीं थीं, जहाँ छोटे-बड़े का मान और सामूहिक निर्णय की परंपरा थी। खेत-खलिहान अनाज से भरे रहते थे और घरों के खूंटों पर बँधे गाय-बैल परिवार का हिस्सा हुआ करते थे। गंगा-जमुनी तहजीब और आस्था के द्वार
बलड़ी की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्कृति थी। यहाँ आस्था के दो मज़बूत स्तंभ थे,एक ओर बैडे वाले पीर बाबा का दरश-परस था, जहाँ हर दुखी मन को शांति मिलती थी, तो दूसरी ओर बजरंग मंदिर की घंटियाँ जीवन में सात्विक ऊर्जा भरती थीं।
यहाँ का मोहर्रम और ताजिया उत्सव अपनी विशिष्ट पहचान रखता था। ताज़ियों की वह नक्काशी और गम-ए-हुसैन में शरीक होने वाला पूरा गाँव,यह नज़ारा हिंदू-मुस्लिम एकता की एक ऐसी मिसाल था, जो आज के दौर में दुर्लभ है।
मेलों और त्योहारों का रंगीन संसार
गाँव का कैलेंडर त्योहारों और मेलों से तय होता था,
नर्मदा नदी के घाट पर भूतड़ी अमावस का मेला श्रद्धा और रोमांच का वह संगम, जहाँ दूर-दूर से लोग आते थे।
*नाग पंचमी अखाड़ों की गूंज और मिट्टी की कुश्ती का वह जोश। भुजरिया तेवहार का रंगीन मौसम,
ईद, दिवाली और गणेश उत्सव,इन त्योहारों में पूरा गाँव एक घर बन जाता था। मिठाइयों का आदान-प्रदान और सामूहिक खुशियाँ ही बलड़ी की असली दौलत थीं। मिडिल स्कूल का टूर्नामेंट, कबड्डी खो खो, वालीबॉल,
कला और मनोरंजन की विरासत
उस दौर में मनोरंजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कार थे।
रंगमंच,चाणक्य-माणक के नाटकों और रामलीला का वह जीवंत अभिनय, जिसकी गूंज आज भी कानों में है। कठपुतली के खेल और रात-रात भर चलने वाली कव्वालियों,की महफ़िलें रूह को सुकून देती थीं।
आर्केस्ट्रा, गाँव में होने वाले आर्केस्ट्रा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अपना ही क्रेज था।
प्रशासनिक गरिमा,गाँव का रेंज ऑफ़िस जो अपनी व्यवस्था और हरियाली के लिए जाना जाता था, बलड़ी की एक अलग पहचान सुनिश्चित करता था।
करीम चचा का झूला और वह सुनहरी शामें
हमें याद है करीम चचा का वह झूला जहाँ बचपन की किलकारियाँ गूँजती थीं। शाम होते ही घरों के बाहर टंगे लालटेन की मद्धम रोशनी गाँव को एक अलौकिक सुंदरता देती थी। वह ‘सुनहरी शाम’ जब ढलती थी, तो ऐसा लगता था जैसे प्रकृति स्वयं हमें लोरी सुना रही हो।
आज भले ही बलड़ी की वह भौतिक धरती नर्मदा मैया की गोद में विश्राम कर रही है, लेकिन वह संस्कृति और वह परिवेश आज भी हम सबके भीतर जीवित है। हरसूद का वह हिस्सा जिसे हमने खोया, वह केवल ज़मीन का टुकड़ा नहीं था, वह एक पूरी सभ्यता थी। हमारे खेत, खलिहान, शिक्षक, पीर बाबा और बजरंग मंदिर ये सब हमारी रगों में दौड़ते संस्कारों के रूप में आज भी अमर हैं।
बलड़ी केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक ‘एहसास’ है, जो ताउम्र हमारे साथ रहेगा।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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