लघुकथा – प्रायश्चित
मालिक सेवाराम की तबियत बहुत खराब है। सांस चल रही है। आईसीयू में भर्ती हैं। एक बड़ी कंपनी के मालिक जिसकी मौत से हजारों लोगों की नौकरी जा सकती है। कंपनी को कोई संभालने वाला नहीं है।
मालिक अनुशासन को मानने वाला, कड़क मिजाज के कारण सारे कर्मचारी नाखुश थे। करनी का फल है। मालिक हम लोगो से कायदे से बात नहीं करता था। सारे कर्मचारी उस मालिक के बीमार होने से खुशी मना रहे थे। सबने लडडू बांटे और पटाखे छुड़ाये।
एक बुजुर्ग कर्मचारी ने नाराजगी व्यक्त की। इस तरह से मिठाई, पटाखे सुनकर बेचारे का हृदय बैठ जाने लगा। कितना अनर्थ हो रहा है। सबको बुलाकर बुजुर्ग ने समझाया–भले हमारे साथ वे कड़क रहे। उनका व्यवहार भले कठोर रहा पर वह हमारा मालिक है। रोजी-रोटी है।
बुजुर्ग की बातें सुनकर एक भयंकर सन्नाटा छा गया। खामोश सबके सब। बुजुर्ग ने अपना अनुभव बताया। जिस मालिक की बुराई कर रहे हो। वह मालिक जिस दिन चला जायेगा। हमारी कंपनी बंद हो जायेगी। हमारे बच्चों की फीस नहीं जमा हो पायेगी। घर में रोटियां नहीं बन पायेंगी। तुम्हारे पर्स में पैसे कहां से आयेंगे। एक भयंकर तबाही आ जायेगी।
हम सबको मिलकर ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा मालिक सही होकर आ जाये। ठप पड़ी कंपनी पुनः चालू हो जाये। हमारी रोजी-रोटी बरकरार रहे। सबकी जैसे आंखें खुल गयी। सबको ऐसे महसूस हुआ जैसे अपने पैर पर कुल्हाड़ी से वार खुद कर रहे हैं। सबने अपने गलती का प्रायश्चित किया।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
