सफर दर्द से गौरव का
कांच के रास्तों पर नंगे पैर चली है वो,
रूढ़ियों की बेरहम आग में हर पल जली है वो,
जिन्हें अमानवीय समाज ने बहिष्कृत कर दिया,
उसी अंधियारी कोख से मशाल बनकर ढली है वो,
नाहक बेड़ियां,झूठी रस्में,और समाज का वो ताना,
हर कदम पर था बस पाबंदियों का ही बहाना,
पर उसने दर्द को ही अपनी तलवार बना लिया,
सीख लिया हर ज़ुल्म के आगे आंखें तान जाना,
आर्थिक मंदी के उस गहरे,स्याह दलदल से,
वह उठ खड़ी हुई अपने आत्मबल के संबल से,
कौड़ी-कौड़ी को तरसाया था जिस मतलबी जहां ने,
आज कांप रहा है वो उसके पुरुषार्थ के कल से,
छीन ली थी जिसने कभी सर उठाने की आज़ादी,
उसी समाज को दिखाई उसने स्वावलंबन की वादी,
अधिकारों की लड़ाई में वो कभी झुकी नहीं,
कौरव-समूह से लड़कर उसने नई गाथा लिख दी,
यह सफर केवल एक जीत का तराना नहीं है,
घुट-घुट कर जीने का अब कोई बहाना नहीं है,
यह कहानी है दर्द के समंदर को पार करने की,
अब मस्तक पर स्वाभिमान का गौरव है,
इसे मिटाना नहीं है,
पथ प्रदर्शन खातिर दर्द संजोए रखना है,
इसे कभी भुलाना नहीं है।
— राजेन्द्र लाहिरी
