सत्ता पक्ष की ख़ामोशी और विपक्ष की विवशता के बीच रामलीला मैदान की गूंज
दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान महज़ ईंट-पत्थरों और रेती का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र का वह जीवंत थर्मामीटर है, जो जब भी तपता है, देश के राजनीतिक तापमान का सही अंदाज़ दे देता है। आपातकाल के काले दिनों से लेकर जनलोकपाल और किसान आंदोलनों तक, इस मैदान ने देश के हर बड़े जन-विप्लव की पटकथा को अपनी छाती पर लिखा है। एक बार फिर यह मैदान सुलगती राजनीति, बहती हवाओं और बदलते तेवरों का गवाह बना है। लेकिन सवाल यह है कि इस जनसैलाब से हासिल क्या हुआ? क्या विपक्ष इस ऊर्जा को सही मुक़ाम तक पहुंचा पाया? क्या सत्ता पक्ष की रणनीतिक चुप्पी और उदासीनता लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है? इन तमाम सवालों के बीच ये आलेख “नेपथ्य में जाते मुद्दे और जगी हुई उम्मीदें” आज के समय का सबसे सटीक और आईना दिखाने वाला दस्तावेज बन जाता है।
जब भी रामलीला मैदान में हताश और निराश जनता का हुजूम उमड़ता है, सत्ता के गलियारों में शुरुआती हलचल और बेचैनी दिखना स्वाभाविक है। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि इस बेचैनी का अनुवाद ठोस संवाद या नीतिगत बदलाव में नहीं होता। सरकारें अक्सर ऐसे आंदोलनों को ‘मौसमी तूफ़ान’ मानकर उनके गुज़र जाने का इंतज़ार करती हैं।
बेरोज़गारी, आर्थिक असमानता, मंहगाई और अधिकारों की रक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं पर सीधी और पारदर्शी प्रतिक्रिया देने के बजाय, उन पर राजनीतिक पर्दा डालने की कोशिश की जाती है।
जब सत्ता पक्ष जनता की जायज़ मांगों पर ख़ामोश रहता है या उन्हें केवल राजनीतिक दलों का प्रायोजित षड्यंत्र करार देता है, तो यह लोकतंत्र की मूल आत्मा यानी ‘संवाद’ पर सीधा प्रहार होता है।
इस बार के आंदोलन का सबसे अनूठा और क्रांतिकारी पहलू रहा है,’जेन जी’ की मुख़र भागीदारी। जिस पीढ़ी को अब तक रील्स, मीम्स और वर्चुअल दुनिया तक सीमित मान लिया गया था, उसने जब सड़कों पर उतरकर तख्तियां थामीं, तो उसने स्थापित राजनीतिक पंडितों को भी चौंका दिया।
यह पीढ़ी तकनीक और ज़मीन का बेहतरीन तालमेल बिठाना जानती है। वे सोशल मीडिया के ज़रिए सेकंडों में किसी मुद्दे को राष्ट्रीय ट्रेंड बना देते हैं और भौतिक रूप से मैदान में डटकर सिस्टम को झकझोर भी देते हैं।
हालांकि, यह आशंका भी उतनी ही वास्तविक है कि यदि इस तात्कालिक और तेज़ ऊर्जा को कोई ठोस वैचारिक नेतृत्व और स्पष्ट एजेंडा नहीं मिला, तो यह निराशा के ठंडे बस्ते में जा सकती है। पर यह भी सच है कि डिजिट्ल युग की यह पीढ़ी पारंपरिक आंदोलनों की तरह आसानी से थकती नहीं है ,यह मुद्दों को वर्चुअल स्पेस में तब तक ज़िंदा रखती है, जब तक व्यवस्था पसीज न जाए।
रैली में उमड़ी भीड़ के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या विपक्ष को कुछ हासिल हुआ? और क्या आम आदमी के हाथ महज़ मायूसी लगी है? रैलियों के समाप्त होने के बाद जब मंच खाली होते हैं, कुर्सियां अपनी ख़ामोश दुनिया में लौटती हैं और नेता अपने वातानुकूलित दफ्तरों में चले जाते हैं, तब आम आदमी की ज़िंदगी फ़िर से उसी संघर्ष और महंगाई की चक्की में पिसने लगती है।
विपक्ष की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह रही है कि वह भीड़ को वोट या नीतिगत दबाव में तब्दील करने की दीर्घकालिक रणनीति बनाने में अक्सर चूक जाता है।
जब रैलियों के बाद कोई ठोस परिणाम नहीं दिखता, तो जनता के भीतर यह भावना घर करने लगती है कि क्या ‘थक-हारकर बैठ जाना’ ही उनका मुक़द्दर बन गया है? क्या लोकतंत्र में हाथ मलना ही हमारा आखिरी विकल्प रह गया है?
इतिहास गवाह है कि रामलीला मैदान का हर आंदोलन कभी न कभी शांत ज़रूर हुआ है, और उसके बाद के दिनों में अख़बारों की सुर्खियां भी ठंडी पड़ जाती हैं। मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और राजनीति अपने पुराने चक्र पर लौट आती है।
लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि सब कुछ व्यर्थ हो गया। रामलीला मैदान की रेती पर छूटे निशान भले ही कल धूल में मिल जाएं, वे हवा में एक अदृश्य वैचारिक बीज बो जाते हैं।
जनता के भीतर सुलग रही यह चिंगारी पूरी तरह बुझती नहीं है। यह इस बात का निरंतर अहसास कराती रहती है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को कागजों के नेपथ्य में या फ़ाइलों के बस्ते में बहुत दिनों तक दबाकर नहीं रखा जा सकता।
सटीक दृष्टिकोण से देखा जाए तो, रामलीला मैदान की ये रैलियां और प्रदर्शन सिर्फ़ विरोध का ज़रिया नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य की जांच करने का पैमाना हैं। सत्ता पक्ष की ख़ामोशी और विपक्ष की विवशता के बीच, असली ताक़त उस आम नागरिक और युवा पीढ़ी की है जो हर बार नए सिरे से उम्मीद जगाती है।
थककर बैठ जाना लोकतंत्र का डीएनए नहीं है। कुर्सियां और सत्ता भले ही कुछ समय के लिए चुप्पी साध ले। लेकिन जन-आकांक्षाओं का यह ज्वार व्यवस्था को आईना दिखाता रहेगा। बदलाव रातों-रात नहीं आते, लेकिन जब तक जनता सवाल पूछना बंद नहीं करती, तब तक लोकतंत्र की उम्मीदों का सूरज भी डूब नहीं सकता।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़

रामलीला मैदान में हुई इंडी गठबंधन की ‘वोट बचाओ’ रैली सुपर फ्लॉप रही है। दस लाख की भीड़ लाने के दावों के बाद भी उस रैली में आनेवाले लोगों की अधिकतम संख्या 35-40 हजार आँकी गयी है, जो दावे के मात्र 4 प्रतिशत के बराबर है। मैदान में रखी खाली कुर्सियाँ मंच पर विराजमान नेताओं को मुँह चिढ़ा रही थीं। सबसे अधिक अपमानजनक दृश्य तो वह था कि जब सबसे प्रमुख नेता राहुल गाँधी ने बोलना शुरू किया तो लोगों ने खड़े होकर लौटना प्रारम्भ कर दिया।
ऐसी रैली करके विपक्ष ने अपनी पोल खोल दी है और यह स्पष्ट हो गया है कि मोदी जी 2029 में भी कहीं जानेवाले नहीं हैं।